By: Vikash Kumar (Vicky)
देवघर : 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक पावन धाम बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग में होली का उत्सव केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है। यहां हरी और हर के दिव्य मिलन की अनूठी परंपरा निभाई जाती है, जिसे देखने और उसमें सहभागी बनने के लिए देशभर से श्रद्धालु देवघर पहुंचते हैं।

सोमवार को इस विशेष परंपरा के तहत बाबा मंदिर का पट शाम 4:00 बजे बंद कर दिया गया। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार शाम 4:30 बजे पुनः पट खोला गया और इसके बाद प्रशासनिक भवन स्थित राधा-कृष्ण मंदिर से पालकी यात्रा की भव्य शुरुआत हुई। राधा-कृष्ण की मूर्तियों को सुसज्जित पालकी में विराजमान कर ढोल-नगाड़ों और शंखध्वनि के बीच मंदिर की परिक्रमा कराई गई।
पालकी पश्चिम द्वार से निकलकर नगर भ्रमण पर निकली। इस दौरान पूरा शहर भक्ति और उल्लास के रंग में रंगा नजर आया। चौक-चौराहों पर श्रद्धालुओं ने पालकी का स्वागत किया। खास तौर पर आजाद चौक और प्रमुख मार्गों पर बड़ी संख्या में भक्त उमड़े। नगर भ्रमण के दौरान मालपुआ का विशेष भोग अर्पित किया गया और बाद में इसे प्रसाद स्वरूप श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया गया।
भक्तों द्वारा “जय कन्हैया लाल की, हाथी-घोड़ा-पालकी” के जयकारों से वातावरण गूंज उठा। भक्ति संगीत, ढोल-नगाड़ों और रंगों की फुहार के बीच पूरी देवघर नगरी आध्यात्मिक उल्लास में डूबी रही।

दोल मंच पर झूला उत्सव
नगर भ्रमण के बाद पालकी को आजाद चौक स्थित दोल मंच पर लाया गया। यहां राधा-कृष्ण की मूर्तियों को झूले पर विराजमान किया गया। भंडारी द्वारा झूला झुलाने की परंपरा निभाई गई। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने झूला झुलाकर अबीर-गुलाल अर्पित किया और आशीर्वाद प्राप्त किया।
इस दौरान सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। मंदिर प्रशासन और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त निगरानी में कार्यक्रम शांतिपूर्वक संपन्न हुआ।
शुभ मुहूर्त में होलिका दहन
मंगलवार तड़के शुभ मुहूर्त में सुबह 5:11 बजे विशेष पूजा-अर्चना के साथ होलिका दहन संपन्न किया जाएगा। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच आचार्य एवं पुजारियों द्वारा विधिवत आहुति दी जाएगी। होलिका दहन के साथ ही रंगोत्सव की औपचारिक शुरुआत मानी जाएगी।
होलिका दहन के बाद पुनः पालकी यात्रा निकलेगी। आजाद चौक से राधा-कृष्ण की मूर्तियों को पालकी में बैठाकर बाबा मंदिर लाया जाएगा। परंपरा के अनुसार राधा रानी को प्रशासनिक भवन स्थित राधा-कृष्ण मंदिर में पुनः स्थापित किया जाएगा, जबकि श्री हरि को डोली से उतारकर सीधे बाबा मंदिर के गर्भगृह में ले जाया जाएगा।

हरी-हर मिलन की अद्भुत परंपरा
गर्भगृह में श्री हरि को बाबा बैद्यनाथ पर विराजमान कर हरी और हर के मिलन की परंपरा निभाई जाती है। यह दृश्य अत्यंत अलौकिक और भावविभोर करने वाला होता है। जैसे ही हरिहर मिलन संपन्न होता है, पूरा परिसर “हर-हर महादेव” और “हरि-हर” के जयकारों से गूंज उठता है।
शास्त्रों में वर्णित है कि इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु द्वारा बाबा बैद्यनाथ की स्थापना की गई थी। इसी मान्यता के आधार पर हरी और हर के मिलन की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसे देवघर की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का अभिन्न अंग माना जाता है।

अबीर-गुलाल के साथ होली का शुभारंभ
हरिहर मिलन के साथ ही श्रद्धालु बाबा पर अबीर-गुलाल अर्पित कर होली की शुरुआत करते हैं। इसके बाद पूरे देवघर में रंगों का उत्सव प्रारंभ हो जाता है। लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं देते हैं और पारंपरिक होली गीतों पर झूमते नजर आते हैं।
बैद्यनाथ धाम की होली का विशेष महत्व है क्योंकि यहां रंगों का उत्सव आध्यात्मिकता और भक्ति से जुड़ा हुआ है। देश के अलग-अलग कोनों से आए श्रद्धालु इस दिव्य मिलन के साक्षी बनकर स्वयं को धन्य मानते हैं।
प्रशासन की विशेष तैयारी
होली और हरिहर मिलन को लेकर प्रशासन ने विशेष तैयारियां की हैं। भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा व्यवस्था, चिकित्सा सुविधा और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया गया है। मंदिर परिसर और नगर के प्रमुख मार्गों पर पुलिस बल की तैनाती की गई है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

आस्था और परंपरा का संगम
देवघर की यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यहां हरी-हर मिलन के साथ यह संदेश दिया जाता है कि वैष्णव और शैव परंपराएं एक ही परम तत्व की आराधना हैं।
जैसे ही बाबा बैद्यनाथ धाम में अबीर-गुलाल चढ़ता है, वैसे ही देवघर में रंगों की होली शुरू हो जाती है। हरिहर के जयकारों के बीच पूरा शहर भक्ति और प्रेम के रंग में सराबोर हो उठता है।
देवघर की इस अनूठी परंपरा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यहां की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और सनातन परंपरा का जीवंत उत्सव

