By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में भड़के भीषण युद्ध और ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के बीच भारत सरकार पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गई है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव को देखते हुए प्रधानमंत्री Narendra Modi ने अपना दो दिवसीय दौरा बीच में समाप्त कर देर रात दिल्ली लौटते ही कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की आपात बैठक बुलाई है।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस उच्चस्तरीय बैठक में रक्षा, विदेश, गृह और वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी शामिल होंगे। बैठक में मिडिल ईस्ट की मौजूदा स्थिति, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, कच्चे तेल की आपूर्ति, व्यापारिक हितों और संभावित महंगाई प्रभाव पर विस्तृत चर्चा होगी।
युद्ध का भारत पर सीधा असर
मिडिल ईस्ट भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद अहम क्षेत्र है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है या समुद्री मार्गों पर खतरा बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और परिवहन लागत पर पड़ेगा, जिससे आम जनता पर महंगाई का बोझ बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। भारत पहले भी ऐसे हालात का सामना कर चुका है, लेकिन इस बार हालात ज्यादा जटिल माने जा रहे हैं क्योंकि इसमें अमेरिका और इजरायल की सीधी भूमिका सामने आई है।

भारतीय नागरिकों की सुरक्षा प्राथमिकता
विदेश मंत्रालय के अनुसार, मिडिल ईस्ट के विभिन्न देशों में लाखों भारतीय नागरिक कार्यरत हैं। इनमें बड़ी संख्या खाड़ी देशों में काम करने वाले श्रमिकों और पेशेवरों की है। सरकार ने सभी दूतावासों को अलर्ट पर रहने और भारतीय नागरिकों को सुरक्षा सलाह जारी करने के निर्देश दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, आवश्यकता पड़ने पर विशेष निकासी अभियान (Evacuation Plan) भी तैयार रखा गया है। इससे पहले भी भारत संकट के समय सफलतापूर्वक अपने नागरिकों को सुरक्षित निकाल चुका है।

रक्षा तैयारियों की समीक्षा
CCS की बैठक में भारत की सैन्य तैयारियों की भी समीक्षा की जाएगी। हालांकि भारत सीधे तौर पर इस संघर्ष का हिस्सा नहीं है, लेकिन वैश्विक सुरक्षा पर इसके असर को देखते हुए एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं। नौसेना को समुद्री मार्गों की निगरानी बढ़ाने और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा सकते हैं।
बाजार और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
मिडिल ईस्ट में युद्ध की खबरों के बाद वैश्विक बाजारों में अस्थिरता देखी जा रही है। भारतीय शेयर बाजार पर भी इसका असर पड़ सकता है। तेल कीमतों में उछाल से चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो सरकार को ईंधन पर टैक्स में कटौती या सब्सिडी जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं, जिससे राजकोषीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।

कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
भारत के अमेरिका, इजरायल और ईरान तीनों देशों से महत्वपूर्ण संबंध हैं। ऐसे में भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है। भारत ने हमेशा संवाद और शांति का समर्थन किया है और क्षेत्र में स्थिरता की अपील की है।
सूत्रों के अनुसार, भारत सभी पक्षों से संपर्क में है और हालात पर लगातार नजर रख रहा है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत शांति की वकालत कर सकता है।
आगे क्या?
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले 48 घंटे बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि तनाव और बढ़ता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर देखने को मिल सकता है। भारत सरकार की आपात बैठक से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार स्थिति को लेकर गंभीर है और हर संभावित खतरे के लिए तैयार रहना चाहती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में होने वाली इस उच्चस्तरीय बैठक के बाद कुछ अहम फैसलों की घोषणा हो सकती है। देश की ऊर्जा सुरक्षा, नागरिकों की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है।
फिलहाल पूरा देश मिडिल ईस्ट के घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। सरकार की रणनीति और आगामी कदमों पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

