By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली : मध्य-पूर्व में जारी चार दिन के सैन्य टकराव का असर भले ही सीधे तौर पर भारत की सीमाओं तक नहीं पहुंचा हो, लेकिन आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर देश को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। हालिया घटनाक्रम में ईरान और इज़राइल के बीच बढ़े तनाव ने वैश्विक बाजारों को झकझोर कर रख दिया है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इस संकट से अछूता नहीं है।

तेल की कीमतों में उछाल
जैसे ही ईरान और इज़राइल के बीच हमलों की खबरें आईं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में अचानक उछाल ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में हर एक डॉलर की बढ़ोतरी से आयात बिल में हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव लंबा खिंचता है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। इसका सीधा असर आम जनता की जेब और महंगाई दर पर पड़ेगा।

शेयर बाजार में गिरावट
तनाव के चौथे दिन भारतीय शेयर बाजार में भी भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। निवेशकों में अनिश्चितता का माहौल है। सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट दर्ज की गई। विदेशी निवेशकों ने भी सतर्क रुख अपनाया है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जंग की स्थिति लंबी हुई तो निवेश पर असर और गहरा हो सकता है। रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है, जिससे आयात और महंगा हो सकता है। यह स्थिति भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ाने वाली साबित हो सकती है।
हवाई सेवाओं पर असर
मध्य-पूर्व क्षेत्र में बढ़ते खतरे को देखते हुए कई एयरलाइंस ने अपनी उड़ानों के रूट बदले हैं। भारत से यूरोप और अमेरिका जाने वाली कई फ्लाइट्स को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है। इससे ईंधन लागत बढ़ रही है और यात्रा समय भी अधिक हो रहा है। हाल ही में भारत सरकार ने स्थिति की समीक्षा के लिए उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। नागरिक उड्डयन मंत्रालय और विदेश मंत्रालय हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है।

व्यापार पर संभावित प्रभाव
मध्य-पूर्व भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। यदि हालात बिगड़ते हैं तो रेमिटेंस और निर्यात-आयात दोनों प्रभावित हो सकते हैं। सोना, पेट्रोकेमिकल्स और उर्वरक जैसे क्षेत्रों में भी कीमतों में उतार-चढ़ाव संभव है।
रणनीतिक चिंता भी बढ़ी
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ सकता है। भारत के लिए यह एक रणनीतिक चिंता का विषय है, क्योंकि बड़ी मात्रा में तेल इसी मार्ग से आता है।

सरकार की तैयारी
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश में आवश्यक वस्तुओं की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। तेल कंपनियों के पास पर्याप्त भंडार है। साथ ही वैकल्पिक स्रोतों से आयात की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है।
विदेश मंत्रालय ने क्षेत्र में रह रहे भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है। दूतावासों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।
आम आदमी पर असर
चार दिन के इस संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक संकटों का असर भारत जैसे बड़े आयातक देश पर तुरंत पड़ता है। महंगाई बढ़ने की आशंका, शेयर बाजार की अस्थिरता और रुपये की कमजोरी से आम लोगों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति जल्द नियंत्रण में आ जाती है तो बाजार भी स्थिर हो जाएंगे। लेकिन यदि संघर्ष लंबा चला तो भारत को आर्थिक मोर्चे पर और बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत सीधे तौर पर इस जंग का हिस्सा नहीं है, फिर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा होने के कारण उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाते हैं, इस पर देश की आर्थिक सेहत काफी हद तक निर्भर करेगी। फिलहाल सरकार सतर्क है और हालात पर करीबी नजर बनाए हुए है।

