By: Vikash Kumar (Vicky)
झारखंड की राजनीति इन दिनों तेजी से बदलते समीकरणों की गवाह बन रही है। राज्य में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की राजनीतिक पकड़ लगातार मजबूत होती दिख रही है, वहीं विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर असंतोष और टूट की खबरें सामने आ रही हैं। धनबाद से लेकर कोडरमा तक भाजपा के कई प्रभावशाली नेताओं का JMM में शामिल होना इस बदलाव की बड़ी मिसाल बन गया है।

हाल ही में धनबाद के पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल और कोडरमा की पूर्व नगर परिषद चेयरमैन शालिनी गुप्ता ने भाजपा छोड़कर JMM का दामन थाम लिया। इन नेताओं का पार्टी छोड़ना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे झारखंड में बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत माना जा रहा है। इन घटनाओं ने भाजपा खेमे में हलचल मचा दी है और संगठनात्मक मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि JMM ने जमीनी स्तर पर अपने संगठन को मजबूत किया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में पार्टी ने स्थानीय मुद्दों, आदिवासी अधिकारों, क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक योजनाओं को केंद्र में रखकर जनता के बीच अपनी पकड़ बनाई है। इसका सीधा असर विपक्षी दलों पर पड़ा है, जहां कई नेता खुद को असहज महसूस कर रहे हैं।

धनबाद के पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल का JMM में जाना भाजपा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। धनबाद भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। ऐसे में अग्रवाल का पार्टी छोड़ना यह दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद की कमी रही है। दूसरी ओर, कोडरमा की पूर्व चेयरमैन शालिनी गुप्ता का कदम भी भाजपा के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि कोडरमा भी भाजपा का प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा है।
झारखंड की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब नेताओं ने पाला बदला हो, लेकिन इस बार बदलाव की गति और दायरा भाजपा के लिए चुनौती बन गया है। पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी, टिकट वितरण को लेकर असंतोष और स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी जैसे मुद्दे सामने आ रहे हैं।

वहीं, JMM इन परिस्थितियों का राजनीतिक लाभ उठाने में सफल होती दिख रही है। पार्टी न केवल विपक्षी दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ रही है, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ा रही है। JMM का यह विस्तार आगामी चुनावों के लिए उसकी रणनीतिक तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, भाजपा को झारखंड में अपने संगठनात्मक ढांचे पर फिर से काम करने की जरूरत है। केवल राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे राज्य की राजनीति में मजबूती बनाए रखना संभव नहीं दिख रहा। स्थानीय मुद्दों, क्षेत्रीय नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल बढ़ाना भाजपा के लिए अनिवार्य हो गया है।

दूसरी ओर, JMM अपनी सामाजिक योजनाओं और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति के सहारे जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता बढ़ा रही है। यही कारण है कि विपक्षी दलों के नेता JMM को अपने भविष्य के लिए बेहतर मंच मान रहे हैं।
इस राजनीतिक उठापटक का असर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में साफ दिखाई दे सकता है। यदि भाजपा अपने असंतोषग्रस्त नेताओं को साधने में असफल रहती है, तो JMM का दायरा और भी बढ़ सकता है।

झारखंड की राजनीति में यह दौर ‘भागमभाग’ का बनता जा रहा है, जहां नेता अपनी राजनीतिक जमीन सुरक्षित रखने के लिए तेजी से फैसले ले रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस स्थिति से कैसे उबरती है और JMM अपनी बढ़त को किस तरह बनाए रखती है।
फिलहाल, इतना स्पष्ट है कि झारखंड की सियासत में नई बिसात बिछ चुकी है। धनबाद से कोडरमा तक हुए इन राजनीतिक बदलावों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति और भी दिलचस्प मोड़ लेने वाली है।
