By: Vikash Kumar (Vicky)
चारधाम यात्रा से जुड़े केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम को लेकर एक बार फिर बड़ा और संवेदनशील मुद्दा सामने आया है। उत्तराखंड में कुछ हिंदू संगठनों और संत समाज की ओर से यह मांग उठाई जा रही है कि केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे पवित्र धामों में गैर-हिंदू श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगाई जाए। इस मांग के सामने आने के बाद धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है।

क्या है पूरा मामला?
हाल के दिनों में केदारनाथ-बद्रीनाथ धाम के आसपास दुकानों, ढाबों और घोड़ा-खच्चर संचालन से जुड़े कुछ मामलों में कथित तौर पर धर्म छिपाकर कारोबार करने के आरोप सामने आए। इसके बाद कुछ हिंदू संगठनों ने दावा किया कि इससे धार्मिक स्थलों की पवित्रता प्रभावित हो रही है। इसी आधार पर उन्होंने मांग की कि केवल हिंदू श्रद्धालुओं और सेवकों को ही इन धामों में प्रवेश की अनुमति दी जाए।

मुस्लिमों तक सीमित नहीं है बहस
शुरुआत में यह चर्चा मुस्लिम समुदाय को लेकर केंद्रित थी, लेकिन अब सवाल और बड़ा हो गया है। धार्मिक जानकारों और सामाजिक संगठनों के बीच यह प्रश्न उठ रहा है कि अगर गैर-हिंदुओं पर रोक लगती है तो क्या सिख, बौद्ध और जैन धर्म को मानने वाले श्रद्धालु भी इससे प्रभावित होंगे?

सिख, बौद्ध और जैन धर्म भारत में उत्पन्न हुए हैं और इन धर्मों के अनुयायी खुद को भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। ऐसे में इन समुदायों को चारधाम जैसे पवित्र स्थलों से बाहर रखना कई लोगों को संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ लग रहा है।
संत समाज की राय
कुछ संतों का कहना है कि केदारनाथ और बद्रीनाथ विशुद्ध रूप से हिंदू आस्था के केंद्र हैं और यहां आने वाले लोगों को मंदिर की परंपराओं और मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। वहीं, कई संत ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि भारत की सनातन परंपरा हमेशा से सर्वधर्म समभाव की रही है और किसी भी धर्म के व्यक्ति को श्रद्धा के साथ आने से नहीं रोका जाना चाहिए।

सरकार का रुख क्या है?
उत्तराखंड सरकार की ओर से फिलहाल इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया गया है। सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कानून और संविधान के दायरे में रहकर ही कोई भी फैसला लिया जाएगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि चारधाम यात्रा एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक यात्रा है, जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं।

कानूनी और संवैधानिक पहलू
संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी धर्म विशेष के आधार पर प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना कानूनी चुनौतियों को जन्म दे सकता है। यदि ऐसा कोई निर्णय लिया जाता है, तो उसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।

सिख, बौद्ध और जैन समुदाय की प्रतिक्रिया
इन समुदायों के कई संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे हिंदू धर्म और चारधाम की परंपराओं का सम्मान करते हैं। उनका कहना है कि वे श्रद्धालु के रूप में जाते हैं, न कि किसी धार्मिक टकराव के लिए। समुदायों का यह भी कहना है कि उन्हें गैर-हिंदू की श्रेणी में रखना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से गलत होगा।

पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर असर
चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। हर साल लाखों श्रद्धालु यात्रा पर आते हैं, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। यदि प्रवेश को लेकर सख्ती बढ़ती है तो इसका सीधा असर पर्यटन, होटल, घोड़ा-खच्चर व्यवसाय और स्थानीय दुकानदारों पर पड़ सकता है।

क्या निकल सकता है समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय सख्त नियम और पहचान सत्यापन जैसे उपाय ज्यादा व्यावहारिक हो सकते हैं। इससे धार्मिक स्थलों की मर्यादा भी बनी रहेगी और सामाजिक सौहार्द भी प्रभावित नहीं होगा। केदारनाथ-बद्रीनाथ में गैर-हिंदुओं की एंट्री को लेकर उठी यह बहस केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संवैधानिक, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं से भी जुड़ी है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या कोई संतुलित
समाधान निकल पाता है।
