लोकसभा में चुनाव सुधारों पर हुई बहस के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की पारदर्शिता और स्टेटमेंट ऑफ इलेक्शन रिजल्ट्स (SIR) की वैधता पर कई गंभीर प्रश्न उठाए। उनके भाषण पर सत्तारूढ़ दल के सांसदों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी, जबकि विपक्ष की अन्य पार्टियों ने तिवारी के बयानों का समर्थन करते हुए चुनाव आयोग की जवाबदेही में सुधार की मांग की।

मनीष तिवारी ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में चुनाव आयोग की नियुक्ति पूरी तरह कार्यपालिका पर निर्भर है, जिससे आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। उनका कहना था कि आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्था को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक है।
तिवारी ने अपने भाषण में विशेष रूप से EVM की विश्वसनीयता का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि कई विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से ईवीएम के Source Code, Data Flow और Randomization Process को सार्वजनिक करने की मांग की है, लेकिन इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। उन्होंने सुझाव दिया कि निर्वाचन प्रक्रिया का और अधिक भरोसेमंद बनाने के लिए VVPAT पर्चियों की 100% गिनती कराई जानी चाहिए। इससे न सिर्फ मतदाताओं का भरोसा बढ़ेगा बल्कि चुनाव परिणामों पर किसी भी तरह के विवाद की गुंजाइश भी कम होगी।
इसके साथ ही उन्होंने SIR (Statement of Election Results) की वैधता पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, कई चुनाव क्षेत्रों में SIR और अंतिम परिणामों के बीच विसंगतियां सामने आई हैं, जिनकी पारदर्शी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनाव परिणामों की घोषणा की प्रक्रिया को डिजिटल और भौतिक दोनों स्तरों पर और अधिक सुरक्षित बनाना समय की आवश्यकता है।
लोकसभा में तिवारी के भाषण के तुरंत बाद बहस का माहौल गर्म हो गया। विपक्षी सांसदों ने तालियां बजाकर उनके विचारों का समर्थन किया, जबकि कई सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन्हें राजनीति से प्रेरित बयान बताया। उनका कहना था कि भारत की चुनाव प्रणाली विश्व के सबसे सुरक्षित और विश्वसनीय प्रणालियों में से एक है, और ईवीएम में छेड़छाड़ का आरोप कई बार अदालतों में भी खारिज किया जा चुका है।
इस बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी चुनाव प्रक्रिया को लेकर विवाद बढ़ गया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में हुए यूपी उपचुनावों में निष्पक्षता की कमी का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि कई सीटों पर प्रशासन और चुनाव आयोग की भूमिका पक्षपातपूर्ण रही और मतगणना प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव देखा गया। यादव ने यह भी कहा कि कई बूथों से ईवीएम की सुरक्षा को लेकर शिकायतें सामने आईं, लेकिन चुनाव आयोग ने इन शिकायतों पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं की।
अखिलेश यादव ने कहा कि अगर चुनाव आयोग खुद को निष्पक्ष और सक्षम संस्था के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है, तो उसे सभी शिकायतों पर तुरंत और पारदर्शी कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि चुनाव आयोग को चुनाव प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र तकनीकी कमेटी बनानी चाहिए जो हर उपचुनाव और सामान्य चुनाव में तकनीकी जांच करती रहे।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव सुधारों पर बहस भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में चुनावों से जुड़े विवाद बढ़े हैं, जिनमें ईवीएम की विश्वसनीयता, आचार संहिता के अनुपालन और चुनाव खर्च की पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर कई बार सवाल उठे हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार और चुनाव आयोग दोनों ही व्यापक सलाह-मशविरे के आधार पर सुधारों को लागू करें तो मतदाताओं का भरोसा और अधिक मजबूत हो सकता है।
बहस के दौरान कुछ सांसदों ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका, विपक्ष और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। इससे आयोग की स्वायत्तता बढ़ेगी और किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका कम होगी। वहीं, कई सदस्यों ने यह भी प्रस्ताव दिया कि चुनाव प्रक्रिया को डिजिटल तकनीक के साथ और सुरक्षित बनाने के लिए ब्लॉकचेन आधारित वोटिंग सिस्टम जैसे आधुनिक विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
लोकसभा में हुई इस बहस के बाद चुनाव सुधारों पर देशभर में नई चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक दलों, चुनाव विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों की ओर से लगातार इस विषय पर नए सुझाव सामने आ रहे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और चुनाव आयोग इन सुझावों को किस तरह से लागू करते हैं और क्या चुनाव प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।

