By: Vikash Kumar (Vicky)
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने चुनाव आयोग को ‘टॉर्चर कमीशन’ करार देते हुए उस पर तुगलकी फरमान जारी करने और पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि एसआईआर (Special Intensive Revision) प्रक्रिया के तहत जिन दस्तावेजों को बिहार में मान्यता दी गई, वही दस्तावेज पश्चिम बंगाल में क्यों खारिज कर दिए गए?

ममता बनर्जी ने कहा कि लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव आयोग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, लेकिन अगर आयोग ही भेदभावपूर्ण रवैया अपनाए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अगर वो 420 हैं… तो मैं 440 वोल्ट हूं।” उनके इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल
मुख्यमंत्री ने अपने बयान में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर विस्तार से सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान जिन दस्तावेजों को बिहार में स्वीकार किया गया, उन्हीं कागजातों को पश्चिम बंगाल में अस्वीकार कर दिया गया। उन्होंने इसे दोहरा मापदंड बताया और कहा कि इससे मतदाताओं के अधिकारों का हनन हो सकता है।

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि कई स्थानों पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं या दस्तावेजों को तकनीकी आधार पर खारिज किया जा रहा है। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया और कहा कि राज्य सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से उठाएगी।
चुनाव आयोग पर ‘टॉर्चर कमीशन’ का आरोप
मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग को ‘टॉर्चर कमीशन’ कहते हुए कहा कि आयोग का काम मतदाताओं को परेशान करना नहीं, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग के कुछ कदम आम लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी राज्य में अलग-अलग नियम लागू किए जा रहे हैं, तो यह संविधान की भावना के खिलाफ है। उनका कहना था कि चुनाव आयोग को सभी राज्यों के लिए समान मानक अपनाने चाहिए।

‘420’ और ‘440 वोल्ट’ बयान के राजनीतिक मायने
ममता बनर्जी का “अगर वो 420 हैं… तो मैं 440 वोल्ट हूं” वाला बयान राजनीतिक दृष्टि से काफी तीखा माना जा रहा है। भारतीय दंड संहिता की धारा 420 धोखाधड़ी से जुड़ी है, और इस संदर्भ में मुख्यमंत्री का बयान सीधे तौर पर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान उनके समर्थकों को मजबूत संदेश देने के उद्देश्य से दिया गया है। इसके जरिए उन्होंने यह जताने की कोशिश की है कि वह किसी भी कथित अन्याय या दबाव के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने को तैयार हैं।

विपक्ष की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री के बयान पर विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं पर इस तरह के आरोप लगाना उचित नहीं है। विपक्ष का तर्क है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था है, और उस पर इस तरह की टिप्पणी लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है।
हालांकि, तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने मुख्यमंत्री के बयान का समर्थन किया है। उनका कहना है कि अगर मतदाताओं के अधिकारों से खिलवाड़ होगा, तो सरकार चुप नहीं बैठेगी।

संवैधानिक और राजनीतिक संदर्भ
भारत में चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी गई है। ऐसे में किसी मुख्यमंत्री द्वारा आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मामला केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि आगे कानूनी या राजनीतिक विवाद का रूप भी ले सकता है।

आगामी चुनावों पर असर?
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है, कि ऐसे बयान आगामी चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। इससे सत्तारूढ़ दल और चुनाव आयोग के बीच टकराव की स्थिति भी बन सकती है। वहीं, यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बन सकता है।
ममता बनर्जी का चुनाव आयोग पर हमला और उनका ‘420 बनाम 440 वोल्ट’ बयान स्पष्ट संकेत देता है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में टकराव का दौर जारी है। एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। अब देखना होगा कि चुनाव आयोग इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या यह विवाद आगे किसी औपचारिक शिकायत या कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचता है।
फिलहाल इतना तय है कि मुख्यमंत्री का यह बयान राजनीतिक तापमान को और बढ़ाने वाला साबित हुआ है।

