By: Vikash Kumar (Vicky)
मणिकर्णिका घाट: मोक्ष की सबसे पवित्र भूमि
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित मणिकर्णिका घाट को हिंदू धर्म में मोक्ष का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार होने से आत्मा को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। यही कारण है कि देश-विदेश से लोग अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए इस घाट पर आते हैं।

कभी न बुझने वाली आग का रहस्य
मणिकर्णिका घाट की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां चिता की आग कभी नहीं बुझती। दिन हो या रात, साल के 365 दिन यहां शवदाह होता रहता है। कहा जाता है कि यह आग हजारों वर्षों से जल रही है और इसे बुझने नहीं दिया जाता।
पौराणिक कथा: शिव और पार्वती से जुड़ा रहस्य
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी पार्वती के कान की मणि (मणिकर्णिका) इसी स्थान पर गिरी थी। भगवान शिव स्वयं यहां शवदाह की अग्नि प्रज्वलित करते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव इस घाट पर स्वयं उपस्थित रहते हैं और मृत आत्मा के कान में तारक मंत्र का उपदेश देते हैं, जिससे उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

डोम समाज और अग्नि की परंपरा
मणिकर्णिका घाट पर अग्नि की देखरेख डोम समाज करता है। परंपरा के अनुसार, अंतिम संस्कार के लिए इसी पवित्र अग्नि से चिता जलाई जाती है। इस अग्नि को बुझने देना अशुभ माना जाता है, इसलिए पीढ़ियों से इसे निरंतर जलाए रखा जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से क्या कहता है सच
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो मणिकर्णिका घाट पर लकड़ी, घी और अन्य सामग्री की लगातार उपलब्धता के कारण आग कभी बुझती नहीं। यहां प्रतिदिन सैकड़ों अंतिम संस्कार होते हैं, जिससे अग्नि को लगातार ईंधन मिलता रहता है। हालांकि, आस्था रखने वालों के लिए इसका महत्व धार्मिक और आध्यात्मिक ही है।
मणिकर्णिका घाट और मोक्ष की आस्था
हिंदू मान्यताओं में काशी को मोक्ष की नगरी कहा गया है और मणिकर्णिका घाट इसका केंद्र बिंदु है। ऐसा विश्वास है कि यहां अंतिम संस्कार होने से व्यक्ति को यमलोक नहीं जाना पड़ता और सीधा मोक्ष प्राप्त होता है।

आज भी क्यों बना है आस्था का केंद्र
आधुनिक युग में भी मणिकर्णिका घाट आस्था, परंपरा और विश्वास का जीवंत उदाहरण है। यहां की कभी न बुझने वाली आग लोगों को जीवन की नश्वरता और मृत्यु के सत्य का एहसास कराती है।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और लोक विश्वासों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है। वैज्ञानिक तथ्यों और धार्मिक विश्वासों में भिन्नता संभव है।

