नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव से पहले प्रवासी मजदूरों और आम यात्रियों की परेशानियां फिर से सियासी बहस का केंद्र बन गई हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए पूछा है कि “सरकार द्वारा वादा की गई 12,000 स्पेशल ट्रेनें आखिर कहां हैं?”
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में एक वीडियो साझा किया है जिसमें बिहार जाने वाली ट्रेनों में लोगों की भीड़ और अफरा-तफरी नजर आ रही है। कई यात्री ट्रेन की छतों तक लटके हुए दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने लिखा,
“ये तस्वीरें NDA सरकार की धोखेबाजी का सबूत हैं। जनता को सुविधा देने के नाम पर सिर्फ जुमलेबाजी की गई, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद दर्दनाक है।”
रेलवे स्टेशनों पर हंगामा और अफरातफरी
त्योहारी सीजन के चलते उत्तर भारत के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर भीड़ का बेकाबू नजारा देखने को मिल रहा है। दिल्ली, मुंबई, सूरत और अहमदाबाद से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जाने वाली लगभग सभी ट्रेनें पूरी तरह फुल हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई ट्रेनों में यात्रियों की संख्या क्षमता से तीन गुना तक बढ़ गई है। लोग किसी तरह घर पहुंचने के लिए ट्रेन की छतों और गेटों पर लटके हुए दिखाई दे रहे हैं।
एक यात्री ने बताया,
“कंफर्म टिकट तो मिलना नामुमकिन है। वेटिंग 400 से ऊपर है। अब छत पर बैठकर जाना ही एकमात्र विकल्प है।”
NDA सरकार पर राहुल गांधी का आरोप
राहुल गांधी ने इस मुद्दे को सरकार की विफल नीतियों से जोड़ते हुए कहा कि यह दृश्य दिखाता है कि केंद्र और रेलवे मंत्रालय जनता के हितों से कट चुके हैं।
उन्होंने कहा,
“2020 में भी जब लॉकडाउन के दौरान मजदूर पैदल घर जा रहे थे, तब भी सरकार ने वादे किए थे कि विशेष ट्रेनें चलाई जाएंगी। आज 2025 में भी वही स्थिति दोहराई जा रही है।”
राहुल गांधी ने पूछा कि जब केंद्र सरकार ने 12,000 स्पेशल ट्रेनों के संचालन का दावा किया था, तो ज़मीन पर इनका असर क्यों नहीं दिख रहा है? उन्होंने कहा कि यदि इतनी ट्रेनें वाकई चलाई जा रही होतीं, तो यात्रियों को ट्रेन की छतों पर चढ़कर सफर नहीं करना पड़ता।
रेल मंत्रालय की सफाई
वहीं, रेलवे मंत्रालय ने दावा किया है कि त्योहारों के सीजन में 1,500 से ज्यादा फेस्टिव स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं। मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा,
“हमने विभिन्न रूट्स पर अतिरिक्त ट्रेनें चलाई हैं, ताकि यात्रियों को सुविधा मिल सके। भीड़ नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा कर्मियों की तैनाती भी की गई है।”
लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह आंकड़े सिर्फ कागजों तक सीमित हैं और जमीनी स्तर पर लोगों को किसी तरह की राहत नहीं मिल रही।
बिहार-यूपी रूट पर भारी दबाव
त्योहारी सीजन के दौरान सबसे ज्यादा दबाव दिल्ली से पटना, सहरसा, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, गोरखपुर और वाराणसी रूट्स पर देखा जा रहा है।
ट्रेन टिकट की ब्लैक मार्केटिंग भी चरम पर है। यात्रियों का आरोप है कि दलालों के जरिए तीन गुनी कीमत पर टिकट बेचे जा रहे हैं, जबकि रेलवे बुकिंग वेबसाइट लगातार डाउन रहती है। स्थानीय लोगों ने कहा कि रेलवे प्रशासन की लापरवाही के कारण प्लेटफॉर्म पर भगदड़ जैसी स्थिति बन जाती है। कई जगह सुरक्षा कर्मियों को लाठीचार्ज तक करना पड़ा है।
सियासत तेज, सोशल मीडिया पर बहस गर्म
राहुल गांधी के बयान के बाद सोशल मीडिया पर “#TrainJumla” और “#RailwayCrisis” जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि मोदी सरकार सिर्फ “इवेंट मैनेजमेंट” में व्यस्त है, जबकि आम आदमी की समस्याओं पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
भाजपा की ओर से कहा गया कि राहुल गांधी का बयान सिर्फ राजनीतिक स्टंट है। भाजपा प्रवक्ता ने कहा,
“त्योहारी सीजन में भीड़ होना सामान्य है। सरकार लगातार नई ट्रेनें जोड़ रही है। विपक्ष को आलोचना करने से पहले तथ्यों की जांच करनी चाहिए।”
यात्रियों की सुरक्षा पर उठ रहे सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रेनों की छतों पर यात्रा न केवल खतरनाक है बल्कि यह रेलवे एक्ट का उल्लंघन भी है। हर साल ऐसे सीजन में दर्जनों हादसे होते हैं। रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, यात्रियों को प्लेटफॉर्म टिकट और जनरल टिकट के बिना यात्रा न करने की अपील की जा रही है, लेकिन लोगों की भीड़ के आगे सभी प्रयास नाकाम साबित हो रहे हैं।
विश्लेषण: जनता के भरोसे की परीक्षा
त्योहारी भीड़ हर साल बढ़ती है, लेकिन इस बार हालात और बिगड़े हुए दिख रहे हैं। विपक्ष इस स्थिति को “सरकारी असफलता” बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “त्योहारी दबाव” का नतीजा मान रहा हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में यातायात प्रबंधन और बुनियादी ढांचे की कमी अब एक गंभीर समस्या बन चुकी है। त्योहारों के दौरान स्पेशल ट्रेनों की घोषणा सिर्फ औपचारिकता बन गई है l
राहुल गांधी के सवाल ने एक बार फिर सार्वजनिक परिवहन की बदहाली को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है।
बिहार और उत्तर प्रदेश जाने वाली ट्रेनों की भीड़ ने यह साबित कर दिया है कि सरकार के दावों और जनता की ज़रूरतों के बीच अब भी बड़ी खाई मौजूद है।
अब देखना होगा कि केंद्र सरकार इस आलोचना के बाद कितनी पारदर्शिता और तत्परता से स्थिति में सुधार लाती है।

