बांग्लादेश का अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT-BD) सोमवार को एक ऐतिहासिक फैसले में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के विरुद्ध अपराधों (crimes against humanity) का दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाया है। कोर्ट ने यह फैसला उनकी अनुपस्थिति (in-absentia) में सुनाया है, क्योंकि हसीना फिलहाल भारत में हैं।

फैसले का विवरण:
तीन सदस्यीय बेंच, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस एमडी गोलम मर्तुजा मोजुमदार ने की थी, ने पाया कि हसीना ने औपचारिक रूप से प्रदर्शनकारी छात्रों पर “बाहु-रूप शक्तियों” का इस्तेमाल करने के आदेश दिए थे — हेलीकॉप्टरों, ड्रोन और घातक हथियारों का उल्लेख कोर्ट ने अपने निर्णय में किया है।
विशेष रूप से, कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्होंने “चंखरपुल में छह निहत्थे प्रदर्शनकारियों की हत्या” का आदेश दिया, और उनके आदेश के कारण पुलिस और सुरक्षा बलों ने संरचनागत नरसंहार और यातना की कार्रवाई की।
तीन आरोपों में हसीना को दोषी ठहराया गया:
1. अधिकारी आदेश देकर हत्या और अन्य अमानवीय कृत्यों को बढ़ावा देने में शामिल थीं,
2. वे प्रदर्शनकारियों की आवाज़ दबाने के लिए शब्दों और निर्देशों के ज़रिए सक्रिय रूप से भागी थीं,
3. उन्होंने ये सुनिश्चित नहीं किया कि सुरक्षा बल निर्दोष प्रदर्शनकारियों की रक्षा करें — बल्कि, उनकी बेंच के अनुसार, उन्होंने “रैज़ाकर” शब्द का इस्तेमाल कर प्रदर्शनकारियों को अपमानित किया, जिससे हिंसा को बढ़ावा मिला।
दूसरे आरोपी और सह-पीड़ित:
कोर्ट ने हसीना के दो वरिष्ठ सहयोगियों — पूर्व गृह मंत्री आसादुज्ज़मान खान कमल और पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्ला अल-ममुन — को भी दोषी पाया। कमल को भी फांसी की सजा दी गई, जबकि ममुन, जिन्होंने स्टेट विटनेस (राज्य गवाह) बनना चुना, उन्हें पांच साल की सज़ा दी गई।
सुरक्षा और सामाजिक प्रतिक्रिया:
फैसले से पहले ही ट्रिब्यूनल के आसपास तीव्र सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। चार-परत सुरक्षा कवच तैनात किया गया — बांग्लादेश आर्मी, बॉर्डर गार्ड, पुलिस और पैरामिलिटरी बलों को मैदान में रखा गया।
इस फैसले के बाद देश में राजनीतिक तनाव बढ़ गया है। हसीना के समर्थक और उनकी पार्टी — अवामी लीग — ने ट्रिब्यूनल को “राजनीतिक मकसद से संचालित” करार देते हुए इसे “कांगारू कोर्ट” कहा है।
हसीना का रुख:
हसीना ने पहले भी ट्रिब्यूनल पर “राजनीतिक रूप से प्रेरित चरड़ा (charade)” होने का आरोप लगाया था। उनके एक ऑडियो मैसेज में, फैसले के बाद उन्होंने कहा,
“चाहे जो भी फैसला हो, मुझे परवाह नहीं है … यह ज़िन्दगी अल्लाह ने दी है, और सिर्फ वही ले सकता है।”
उन्होंने अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील की है।
मानवाधिकार समूहों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की प्रतिक्रिया:
कुछ मानवाधिकार समूहों ने ट्रिब्यूनल की निष्पक्षता और प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि ट्रिब्यूनल, जिसे हसीना की अपनी सरकार ने 2009 में बनाया था, अब वर्तमान अंतरिम सरकार द्वारा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाने के लिए उपयोग किया जा रहा है।
दूसरी ओर, इस फैसले का स्वागत उन परिवारों ने किया है, जिनके छात्र (पोर्टेस्टर्स) अपनी आवाज़ और न्याय की उम्मीद में लामबंद हुए थे। उन्हें लगता है कि यह फैसला उनकी लड़ाई का एक बड़ा मोड़ है।
संभावित आगे की नीतिगत दिशा:
हसीना अगर बांग्लादेश लौटती हैं या गिरफ्तार होती हैं, तो उन्हें 30 दिन के अंदर अपील का मौका मिलेगा।
भारत में उनकी वर्तमान सुरक्षित स्थिति और प्रत्यर्पण की संभावना पर भी बहस गर्म है। भारत-बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि मौजूद है, लेकिन इसमें “मानवीय आधार” या “राजनीतिक” अपवाद भी हो सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें अब बांग्लादेश पर टिकी हुई हैं: क्या यह फैसला राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को खत्म करने की रणनीति है, या न्याय के लिए ऐतिहासिक कदम?
शेख हसीना को सुनाई गई फांसी की सजा बांग्लादेश के लिए एक संवेदनशील मोड़ है। इस फैसले ने देश में राजनीतिक दरारों को और गहरा किया है, जबकि न्याय, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के महत्व पर बहस को एक नई ऊर्जा दी है। इसके आगे क्या होगा, यह न सिर्फ बांग्लादेश के नागरिकों के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए निर्णायक हो सकता है।

