By: Vikash Kumar ( Vicky )
सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके बढ़ते नकारात्मक प्रभावों को देखते हुए अब दुनिया के कई देश इस पर सख्त कदम उठाने की तैयारी में हैं। ऑस्ट्रेलिया के बाद अब एक और देश में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। सरकार के स्तर पर इसे लेकर संकेत दिए गए हैं कि आने वाले समय में नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सख्त नियम लागू किए जा सकते हैं।

बच्चों पर सोशल मीडिया का बढ़ता असर
पिछले कुछ वर्षों में बच्चों के बीच सोशल मीडिया की लत तेजी से बढ़ी है। पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार पर इसके नकारात्मक प्रभाव को लेकर अभिभावक और विशेषज्ञ लगातार चिंता जता रहे हैं। कई रिसर्च में यह सामने आया है कि कम उम्र में सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल से बच्चों में डिप्रेशन, एंग्जायटी, आत्मविश्वास की कमी और नींद से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। इसी को देखते हुए अब सरकारें यह मानने लगी हैं कि केवल पैरेंटल कंट्रोल या चेतावनी काफी नहीं है, बल्कि कानूनी हस्तक्षेप की जरूरत है।
ऑस्ट्रेलिया के फैसले ने दुनिया का ध्यान खींचा
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया ने बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने के लिए कड़े नियमों की घोषणा की थी। वहां सरकार का कहना है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से दूर रखना जरूरी है, ताकि उनकी मानसिक और भावनात्मक सेहत सुरक्षित रह सके। ऑस्ट्रेलिया के इस कदम के बाद अब कई अन्य देश भी इसी दिशा में सोचने लगे हैं।
अब इस देश में भी बैन की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक, एक और देश में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सरकार गंभीर कदम उठाने पर विचार कर रही है। प्रस्तावित नियमों के तहत नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाना मुश्किल हो सकता है। इसके लिए उम्र सत्यापन (Age Verification) को अनिवार्य किया जा सकता है। सरकार का मानना है कि टेक कंपनियों को भी इस जिम्मेदारी से बचने नहीं दिया जा सकता। अगर प्लेटफॉर्म्स नियमों का पालन नहीं करते हैं तो उन पर भारी जुर्माना या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
क्यों जरूरी हो रहा है सोशल मीडिया बैन
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के दिमाग पर सोशल मीडिया का असर बहुत गहरा होता है। कम उम्र में लाइक्स, फॉलोअर्स और ट्रोलिंग जैसी चीजें बच्चों के मानसिक संतुलन को बिगाड़ सकती हैं। कई मामलों में साइबर बुलिंग और ऑनलाइन फ्रॉड के शिकार भी बच्चे ही होते हैं। सरकारों का मानना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ी पर इसका असर और भी गंभीर हो सकता है।

सोशल मीडिया कंपनियों की बढ़ेगी जिम्मेदारी
अगर यह बैन लागू होता है, तो सोशल मीडिया कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म्स में बड़े बदलाव करने होंगे। उम्र सत्यापन सिस्टम को मजबूत करना, बच्चों से जुड़ा कंटेंट फिल्टर करना और पैरेंटल कंट्रोल को और सख्त बनाना अनिवार्य हो सकता है। कुछ टेक कंपनियां पहले से ही इन नियमों का विरोध कर रही हैं और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रही हैं। हालांकि सरकार का साफ कहना है कि बच्चों की सुरक्षा किसी भी बहस से ऊपर है।
अभिभावकों और समाज की भूमिका
सरकार के साथ-साथ अभिभावकों की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल बैन से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि बच्चों को डिजिटल दुनिया के फायदे और नुकसान दोनों के बारे में समझाना जरूरी है। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy) को बढ़ावा देने और बच्चों को ऑफलाइन गतिविधियों की ओर प्रेरित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
क्या भारत में भी हो सकता है ऐसा नियम?
इस वैश्विक ट्रेंड को देखते हुए यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भविष्य में भारत जैसे देशों में भी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सख्त नियम लागू हो सकते हैं। फिलहाल भारत में इस तरह का कोई पूर्ण बैन नहीं है, लेकिन डेटा प्राइवेसी और ऑनलाइन सेफ्टी को लेकर चर्चा लगातार बढ़ रही है।
ऑस्ट्रेलिया के बाद अब एक और देश में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन की तैयारी यह साफ संकेत देती है कि दुनिया भर में सरकारें बच्चों की मानसिक सेहत को लेकर गंभीर हो चुकी हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा वैश्विक बहस का विषय बन सकता है और कई देश इस दिशा में ठोस कदम उठा सकते हैं।
