By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली। शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने और शादी के वादे पर बने संबंधों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने अहम टिप्पणी की है। दुष्कर्म और शादी के वादे से जुड़े एक मामले में जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान Supreme Court of India ने कहा कि सहमति (Consent) और शादी के झूठे वादे के आधार पर बने संबंधों के बीच स्पष्ट अंतर समझना आवश्यक है। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि हर असफल प्रेम संबंध या टूटा हुआ वादा स्वतः दुष्कर्म का मामला नहीं बन जाता।

यह टिप्पणी जस्टिस B. V. Nagarathna और जस्टिस Ujjal Bhuyan की द्विसदस्यीय पीठ ने की। अदालत एक ऐसे मामले में आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप था कि शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाए गए और बाद में विवाह से इनकार कर दिया गया।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं और बाद में किसी कारण से विवाह नहीं हो पाता, तो हर ऐसे मामले को दुष्कर्म की श्रेणी में रखना कानून की मंशा के अनुरूप नहीं है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यह जांचना आवश्यक है कि क्या शुरू से ही आरोपी का इरादा धोखा देने का था या परिस्थितियों के बदलने से संबंध आगे नहीं बढ़ सका।

पीठ ने यह भी कहा कि समाज में बदलते मूल्यों के बीच अदालत को तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेना होता है, न कि केवल नैतिक दृष्टिकोण से। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जहां शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा कर महिला की सहमति प्राप्त की गई हो, वहां मामला अलग होगा और इसे गंभीरता से देखा जाएगा।

‘सहमति’ और ‘भ्रमित सहमति’ का कानूनी फर्क

‘सहमति’ और ‘भ्रमित सहमति’ का कानूनी फर्क
भारतीय दंड संहिता के तहत दुष्कर्म के मामलों में ‘सहमति’ (Consent) की अवधारणा केंद्रीय है। यदि सहमति किसी धोखे या झूठे वादे के आधार पर ली गई हो, तो उसे ‘भ्रमित सहमति’ माना जा सकता है। अदालतों ने कई फैसलों में कहा है कि यह देखना जरूरी है कि क्या आरोपी का शुरू से ही विवाह करने का इरादा नहीं था और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से झूठा वादा किया। सुप्रीम कोर्ट की इस ताजा टिप्पणी से यह संदेश गया है कि हर असफल प्रेम प्रसंग को आपराधिक रंग देना उचित नहीं, लेकिन जहां धोखे का तत्व स्पष्ट हो, वहां कानून सख्ती से लागू होगा।

जमानत पर सुनवाई में क्या हुआ?
मामले में आरोपी ने जमानत की मांग की थी। बचाव पक्ष की दलील थी कि संबंध आपसी सहमति से बने थे और दोनों वयस्क थे। वहीं, अभियोजन पक्ष ने कहा कि शादी का वादा कर संबंध बनाए गए और बाद में मुकर गए, जो गंभीर अपराध है। पीठ ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों का अवलोकन करते हुए कहा कि जमानत पर निर्णय लेते समय अदालत को आरोपों की प्रकृति, साक्ष्यों की स्थिति और जांच की प्रगति को देखना होता है। अदालत ने यह भी दोहराया कि जमानत का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं है, बल्कि यह केवल ट्रायल के दौरान अस्थायी राहत है।

बदलते सामाजिक संदर्भ में अदालत की भूमिका
अदालत की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब शादी से पहले संबंधों को लेकर समाज में विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं। शहरी और शिक्षित वर्गों में लिव-इन और प्री-मैरिटल रिलेशनशिप की स्वीकृति बढ़ी है, वहीं पारंपरिक सोच अब भी मजबूत है। अदालत ने संकेत दिया कि न्यायिक प्रक्रिया तथ्यों और कानून पर आधारित होती है, न कि व्यक्तिगत नैतिक मान्यताओं पर।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के दौरान निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है। इससे ‘शादी के वादे पर दुष्कर्म’ से जुड़े मामलों में इरादे (Intention) और परिस्थितियों की गहन जांच पर जोर बढ़ेगा।
पहले भी आ चुके हैं ऐसे फैसले
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालय पहले भी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि यदि संबंध लंबे समय तक चले हों और दोनों पक्षों के बीच बराबरी का रिश्ता रहा हो, तो केवल विवाह न होने से दुष्कर्म का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं होता। हालांकि, यदि यह साबित हो जाए कि आरोपी ने शुरू से ही धोखे की नीयत से संबंध बनाए, तो कठोर दंड का प्रावधान है।

समाज और कानून के बीच संतुलन

समाज और कानून के बीच संतुलन
यह मामला एक बार फिर उस बहस को सामने लाता है कि व्यक्तिगत रिश्तों और आपराधिक कानून की सीमाएं कहां तय हों। अदालत की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि न्यायालय प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहता है—न तो वास्तविक पीड़ितों के साथ अन्याय हो और न ही हर असफल रिश्ते को अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाए।

फिलहाल, इस मामले में अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर होगा। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों की कानूनी व्याख्या पर प्रभाव डाल सकती है।

