पाटलिपुत्र/ तेज प्रताप यादव की राजनीतिक पार्टी के उम्मीदवार धर्मेंद्र क्रांतिकारी ने हाल ही में नामांकन दाखिल किया, लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान एक ऐसी स्थिति बन गई जिसने सबकी नजरें खींच ली। वे हथकड़ी में और भारी पुलिस सुरक्षा के बीच नामांकन दाखिल करते दिखे, जिससे चुनावी हलके में उथल-पुथल मच गई है।
धर्मेंद्र क्रांतिकारी, जो तेज प्रताप यादव की नई राजनीतिक क्रांति में हिंदोस्तान के राजनैतिक मंच पर उभरते चेहरे हैं, उन्होंने चुनावी प्रक्रिया के अंतर्गत नामांकन दाखिल करते समय अपने साथ सुरक्षा बलों की मौजूदगी सुनिश्चित कराई थी। इस दौरान उन्हें पुलिस द्वारा कफनाए गए हाथों के साथ देखा गया। इस दृश्य ने राजनीतिक विरोधियों व आम जनता में सवाल खड़े कर दिये कि आखिर यह क्यूँ? क्या कानून का उल्लंघन हो रहा है, या चुनावी रणनीति का हिस्सा है?
सूत्रों के अनुसार, धर्मेंद्र क्रांतिकारी को पुलिस सुरक्षा दी गई क्योंकि नामांकन दाखिल करने से पूर्व उन्हें संभावित सुरक्षा खतरे की आशंका थी। नामांकन जमा करने का स्थान भी विवादों से घिरा हुआ है — जहां पर नगर प्रशासन और पुलिस बल की भूमिका रही। नामांकन जमा करने की प्रक्रिया के दौरान, पुलिस ने भीड़ नियंत्रण व सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा रखा, जिससे उम्मीदवार और उनके समर्थकों को धमकी या अन्य संभावित व्यवधान से बचाने का दावा किया गया है।
हालांकि, सरकार और पुलिस प्रशासन द्वारा अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है जिसमें इस पूरी घटना की कानूनी या प्रशासनिक समीक्षा की जा रही हो। विपक्षी दलों ने इस घटना को राजनीतिक साज़िश और लोकतंत्र की मर्यादा पर हमला करार दिया है। कुछ ने दावा किया कि हथकड़ी का प्रयोग उम्मीदवार की छवि को बदनाम करने की कोशिश है, जबकि अन्य ने कहा कि अगर सुरक्षा की जरूरत थी, तो नियमों और प्रक्रियाओं का पालन होना चाहिए था।
वहीं धर्मेंद्र क्रांतिकारी के समर्थकों ने कहा कि यह राजनीति का हिस्सा है; विरोधी दल इस तरह के नाटकीय तरीकों से चुनावी माहौल को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। समर्थकों का मानना है कि इस घटना से उनकी जात-राष्ट्र, समाज व कानून व्यवस्था पर प्रश्न उठेंगे और जनता इस तरह के तरीकों को नकारेगी।
चुनावी प्रक्रिया के विशेषज्ञ इस मामले को न केवल कानून के दायरे में, बल्कि राजनीतिक संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में भी देख रहे हैं। नामांकन दाखिल करने का अधिकार लोकतंत्र की बुनियादी इकाई है। यदि किसी उम्मीदवार को इस प्रक्रिया में इस तरह बाधा या अपमान झेलना पड़े, तो यह चिंता का विषय है। साथ ही, क्या हथकड़ी लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या सार्वजनिक छवि के अधिकार का उल्लंघन नहीं है?
इस घटना का असर आगामी चुनाव प्रचार पर भी दिखने लगा है। धर्मेंद्र क्रांतिकारी ने अपने भाषणों में इस घटना को चुनावी मुद्दा बनाया है, और जनता से अपील की है कि वे इस तरह की कार्रवाई को सामान्य न समझें। तेज प्रताप यादव की पार्टी ने भी कहा है कि यह घटना राज्य सरकार की दबाव राजनीति और मनमाने तरीके से डराने-धमकाने की नीति का हिस्सा है।
राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा है कि यदि इस प्रकार की स्थितियों से उम्मीदवार भयभीत हो गये तो चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा कैसे बना रहेगा। कानून विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि नामांकन प्रक्रिया में सुरक्षा की आवश्यकता है तो उसका प्रावधान होना चाहिए, लेकिन सत्ता या प्रशासन द्वारा हथकड़ी लगाना एक संवेदनशील मामला है, जिसे न्यायालयों में चुनौती दी जा सकती है।
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस घटना के बाद निर्वाचन आयोग या उच्च न्यायालय कोई कदम उठाएगा या नहीं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस घटना ने तेज प्रताप यादव की पार्टी को एक नया विमर्श दिया है — लोकतंत्र, चुनावी ज़िम्मेदारी और उम्मीदवारों की सुरक्षा की चर्चा।
इस तरह धर्मेंद्र क्रांतिकारी का हथकड़ी में नामांकन दाखिल करना केवल एक दृश्य ही नहीं रहा, बल्कि यह राजनीति के उस रूप को उजागर करता है जहाँ चुनावी प्रक्रिया सिर्फ वोट मांगने की नहीं, बल्कि शक्ति, डर और प्रदर्शन की भी होती है। इस घटना की गूँज न सिर्फ बिहार-झारखंड में बल्कि पूरे देश में राजनीतिक आचरण और लोकतंत्र की मर्यादा पर सवाल खड़े कर रही है।

