By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए ‘इक्विटी कमेटी’ नियमों को लेकर देश की राजनीति और अकादमिक जगत में तीखी बहस छिड़ गई है। इस मुद्दे पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने खुलकर अपना पक्ष रखते हुए इन नियमों का समर्थन किया है। साथ ही उन्होंने सवर्ण वर्ग के एक हिस्से द्वारा किए जा रहे विरोध को “नाजायज” करार दिया है। हालांकि, मायावती ने यह भी कहा कि सामाजिक तनाव से बचने के लिए इन नियमों को लागू करने से पहले व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए था।

मायावती का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश के कई केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों में ‘इक्विटी कमेटी’ को लेकर असहमति और आशंकाएं सामने आ रही हैं। UGC के नए नियमों के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसी समितियों के गठन का प्रावधान किया गया है, जो जाति, धर्म, लिंग, भाषा और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव की शिकायतों की निगरानी और समाधान करेंगी।

मायावती का पक्ष: सामाजिक न्याय की जरूरत
मायावती ने अपने बयान में स्पष्ट कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में उच्च शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि दलित, पिछड़े और वंचित वर्ग के छात्र आज भी कई संस्थानों में भेदभाव का सामना करते हैं, चाहे वह प्रवेश प्रक्रिया हो, हॉस्टल आवंटन हो या अकादमिक मूल्यांकन। ऐसे में ‘इक्विटी कमेटी’ जैसे तंत्र सामाजिक न्याय को मजबूत करने में सहायक हो सकते हैं।

बसपा प्रमुख ने कहा कि जो लोग इन नियमों का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि यह व्यवस्था किसी एक वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि भेदभाव के खिलाफ है। उनके अनुसार, सवर्ण वर्ग का विरोध इस बात को दर्शाता है कि समाज में समानता को लेकर अभी भी मानसिक बदलाव की जरूरत है।
“सवर्णों का विरोध नाजायज” – बयान का अर्थ
मायावती का “सवर्णों का विरोध नाजायज” वाला बयान राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है। इस बयान के जरिए उन्होंने यह संकेत दिया कि सामाजिक सुधारों का विरोध केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वे परंपरागत सत्ता संरचना को चुनौती देते हैं। उनका कहना है कि अगर किसी नीति का उद्देश्य भेदभाव खत्म करना है, तो उसे जातिगत चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

हालांकि, इस बयान को लेकर आलोचक यह तर्क दे रहे हैं कि किसी भी वर्ग की आशंकाओं को पूरी तरह खारिज करना संवाद की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और सहमति, दोनों का महत्व होता है।
व्यापक विचार-विमर्श की बात क्यों?
मायावती ने समर्थन के साथ-साथ यह भी कहा कि UGC को इन नियमों को लागू करने से पहले सभी हितधारकों—छात्रों, शिक्षकों, विश्वविद्यालय प्रशासन और सामाजिक संगठनों—से बातचीत करनी चाहिए थी। उनका मानना है कि बिना पर्याप्त संवाद के किसी भी नीति को लागू करने से गलतफहमियां और सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।

यह टिप्पणी बताती है कि मायावती केवल राजनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि नीति-निर्माण की प्रक्रिया में समावेशिता की वकालत भी कर रही हैं। यह रुख उन्हें अन्य दलों से अलग करता है, जो या तो नियमों का पूरी तरह समर्थन कर रहे हैं या पूरी तरह विरोध।
राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ
UGC के इक्विटी कमेटी नियमों पर मायावती का समर्थन उनके पारंपरिक सामाजिक न्याय के एजेंडे के अनुरूप है। यह बयान बसपा के कोर वोट बैंक—दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग—को एक स्पष्ट संदेश देता है कि पार्टी अब भी उनके अधिकारों के मुद्दे पर मुखर है।

वहीं, विपक्षी दलों का मानना है कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण शिक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता है। उनका तर्क है कि विश्वविद्यालयों को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए और शैक्षणिक गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
संतुलन की जरूरत
असल सवाल यह है कि क्या ‘इक्विटी कमेटी’ सामाजिक न्याय और अकादमिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बना पाएगी? समर्थकों का कहना है कि यह व्यवस्था भेदभाव की शिकायतों को एक संस्थागत मंच देगी, जबकि विरोधियों को डर है कि इससे अनावश्यक हस्तक्षेप और ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।

मायावती का बयान इस बहस में एक मध्य मार्ग सुझाता है—नियम जरूरी हैं, लेकिन उन्हें लागू करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर UGC व्यापक संवाद के साथ आगे बढ़ता है, तो यह पहल उच्च शिक्षा में समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

कुल मिलाकर, UGC के नए इक्विटी कमेटी नियमों पर मायावती का समर्थन और सवर्ण विरोध को नाजायज बताना सामाजिक न्याय की बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है। यह मुद्दा सिर्फ शिक्षा नीति का नहीं, बल्कि समाज की सोच और संवेदनशीलता का भी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और UGC इस बहस से क्या सीख लेते हैं और इसे किस दिशा में आगे बढ़ाते हैं।

