By: Vikash Kumar (Vicky)
उत्तर प्रदेश की राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए Special Intensive Revision (SIR) एक बड़ी परीक्षा बनकर सामने आ रही है। आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए शुरू की गई इस प्रक्रिया में करीब एक करोड़ वोटर्स चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते नजर आ रहे हैं। इन मतदाताओं का सत्यापन, पहचान और पते की पुष्टि करना आयोग के लिए आसान नहीं होगा, खासकर तब जब राज्य में जनसंख्या का आकार, शहरीकरण और पलायन जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं।
क्या है SIR और क्यों है यह जरूरी
SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची का एक विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान है, जिसका उद्देश्य फर्जी, मृत, डुप्लीकेट या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम सूची से हटाना और योग्य नागरिकों को जोड़ना है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह प्रक्रिया लोकतंत्र की शुद्धता बनाए रखने के लिए बेहद अहम मानी जाती है।
चुनाव आयोग का मानना है कि मतदाता सूची जितनी अधिक सटीक और पारदर्शी होगी, चुनाव प्रक्रिया उतनी ही निष्पक्ष और भरोसेमंद बनेगी। इसी वजह से आयोग ने इस बार SIR को पहले से अधिक व्यापक और सख्त बनाने का फैसला लिया है।
एक करोड़ वोटर्स क्यों बने चुनौती
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यूपी में मतदाताओं की कुल संख्या करीब 15 करोड़ के आसपास है। SIR के दौरान जिन लगभग एक करोड़ वोटर्स पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, उनमें कई तरह के मामले शामिल हैं—
लंबे समय से मतदान न करने वाले मतदाता
ऐसे नाम जिनके पते या पहचान संदिग्ध हैं
एक ही व्यक्ति के नाम से दो या अधिक स्थानों पर दर्ज वोट
मृत मतदाताओं के नाम
पलायन कर चुके नागरिक
इन सभी मामलों की जमीनी स्तर पर जांच करना चुनाव आयोग और उसके कर्मचारियों के लिए एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है।

बूथ लेवल ऑफिसर्स पर बढ़ा दबाव
SIR की पूरी जिम्मेदारी Booth Level Officers (BLOs) पर होती है। यूपी में हजारों बूथ लेवल अधिकारी घर-घर जाकर सत्यापन कर रहे हैं। एक BLO को औसतन 1200 से 1500 मतदाताओं की जिम्मेदारी दी जाती है। ऐसे में एक करोड़ मतदाताओं का सही-सही सत्यापन करना समय, संसाधन और मानव शक्ति—तीनों के लिहाज से कठिन कार्य है।
कई इलाकों में BLOs को बंद मकान, गलत पते और गैर-सहयोग जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है। शहरी क्षेत्रों में फ्लैट संस्कृति और लगातार बदलते किरायेदार सत्यापन को और जटिल बना रहे हैं।
राजनीतिक दलों की नजर
SIR प्रक्रिया पर सभी राजनीतिक दलों की पैनी नजर है। विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची में किसी भी तरह की गड़बड़ी चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है। वहीं सत्तारूढ़ दल इसे चुनाव सुधार की दिशा में एक जरूरी कदम बता रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर एक करोड़ वोटर्स के सत्यापन में बड़ी संख्या में नाम हटते या जुड़ते हैं, तो इसका सीधा असर आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों पर पड़ सकता है।
तकनीक से मिल रही मदद
चुनाव आयोग ने इस बार SIR में तकनीक का अधिक इस्तेमाल किया है।
डिजिटल फॉर्म और मोबाइल ऐप
आधार, राशन कार्ड और अन्य दस्तावेजों से क्रॉस-वेरिफिकेशन
ऑनलाइन आपत्तियां और दावे दर्ज करने की सुविधा
हालांकि तकनीक से प्रक्रिया तेज हुई है, लेकिन ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में डिजिटल जागरूकता की कमी अब भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।
आम वोटर की भूमिका
चुनाव आयोग लगातार नागरिकों से अपील कर रहा है कि वे अपने नाम की जांच करें और किसी भी त्रुटि को समय रहते सुधारें। आयोग का कहना है कि SIR केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें आम मतदाता की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर वोटर खुद जागरूक रहें और सही जानकारी दें, तो एक करोड़ वोटर्स की यह चुनौती काफी हद तक आसान हो सकती है।
लोकतंत्र की कसौटी
यूपी में SIR केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता की कसौटी भी है। चुनाव आयोग के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का निष्पक्ष और पारदर्शी सत्यापन संभव है।
आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि चुनाव आयोग इस चुनौती से कैसे निपटता है और क्या वाकई SIR के जरिए मतदाता सूची को पूरी तरह दुरुस्त किया जा सकेगा।
