नई दिल्ली: देश गर्व और सांस्कृतिक चेतना से सराबोर है, क्योंकि भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ की रचना को 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद में आज एक विशेष बहस का आयोजन किया जा रहा है। इस ऐतिहासिक सत्र की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा में करेंगे। उम्मीद है कि यह चर्चा राष्ट्रीय गीत के इतिहास, उसकी रचना-प्रक्रिया, उसके राजनीतिक-सांस्कृतिक महत्व और उन अज्ञात तथ्यों को उजागर करेगी जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय चेतना को नई दिशा दी।

‘वंदे मातरम’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति का एक ऐसा स्वर है जिसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे असंख्य क्रांतिकारियों में ऊर्जा का संचार किया। प्रख्यात साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे 1870 के दशक में रचा था और बाद में यह उनकी सुप्रसिद्ध कृति आनंदमठ का मुख्य स्तंभ बना। इस गीत ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एकजुट करने का काम किया और धीरे-धीरे यह राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनकर उभरा।
बहस का उद्देश्य: विरासत का पुनर्पाठ
संसद में इस विशेष बहस का प्रमुख उद्देश्य ‘वंदे मातरम’ की ऐतिहासिक विरासत को पुनः समझना, उसके संदर्भों को समकालीन भारत के साथ जोड़ना और यह जांचना है कि इस गीत ने विभिन्न युगों में समाज को किस प्रकार प्रभावित किया। संसदीय सूत्रों के अनुसार, यह चर्चा न केवल सांस्कृतिक और साहित्यिक पहलुओं को समेटेगी, बल्कि गीत के राजनीतिक व सामाजिक प्रभावों को भी रेखांकित करेगी।
लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी अपने वक्तव्य में ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्र की आत्मा से जोड़ते हुए इसके प्रेरणास्रोत बनने की भूमिका पर प्रकाश डालेंगे। माना जा रहा है कि वे गीत की वैश्विक पहचान, भारतीय सांस्कृतिक धरोहर और आधुनिक भारत के संदर्भ में इसके महत्व पर बात करेंगे।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: जब ‘वंदे मातरम’ बना आंदोलन की आवाज़
‘वंदे मातरम’ का पहला सार्वजनिक पाठ 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में हुआ था, जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सुरों में पिरोकर प्रस्तुत किया। उस वक्त उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में इस गीत ने नई ऊर्जा का संचार किया। धीरे-धीरे यह नारा बन गया—“वंदे मातरम”—जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारियों की जुबान पर गुंजने लगा।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लाला लाजपत राय, अरविंद घोष, बिपिन चंद्र पाल और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं के भाषणों और जनआंदोलनों में यह गीत बार-बार सुनाई देता था। यह मात्र साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि मानसिक स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया।
अज्ञात तथ्य जो बहस में सामने आ सकते हैं
संसदीय बहस में विशेषज्ञों और सांसदों के वक्तव्यों के जरिए कई अनजानी जानकारियाँ सामने आने की संभावना है, जैसे
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे मूलतः संस्कृत-बंगला मिश्रित भाषा में रचा था, ताकि यह सभी भारतीयों तक पहुँचे।
ब्रिटिश शासन ने इस गीत को कई बार प्रतिबंधित करने की कोशिश की, क्योंकि यह क्रांतिकारियों के बीच प्रेरणा का मुख्य स्रोत बन चुका था।
रवींद्रनाथ टैगोर ने जब इसे पहली बार गाया तो सभा में उपस्थित लोग भावनाओं से अभिभूत होकर खड़े हो गए।
सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज में ‘वंदे मातरम’ को मार्चिंग सॉन्ग के रूप में अपनाया गया।
इन ऐतिहासिक तथ्यों के साथ आधुनिक भारत में ‘वंदे मातरम’ की भूमिका और प्रासंगिकता पर भी चर्चा होगी।
आधुनिक भारत में ‘वंदे मातरम’ का महत्व
आज जब डिजिटल इंडिया और वैश्विक मंचों पर भारत अपनी पहचान स्थापित कर रहा है, तब ‘वंदे मातरम’ जैसे गीत राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करते हैं। यह भारत की मातृभूमि के प्रति समर्पण, सम्मान और गौरव का प्रतीक है।
संसद की बहस में यह भी चर्चा हो सकती है कि कैसे नई पीढ़ी में इस गीत के इतिहास और महत्व को सहज रूप से पहुँचाया जाए। विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे सकते हैं कि पाठ्यक्रमों में इसे किस रूप में शामिल किया जा सकता है या सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से इसे और लोकप्रिय बनाया जा सकता है।
राजनीतिक हलकों में उत्सुकता
इस विशेष चर्चा को लेकर सभी दलों में उत्साह है। विपक्ष के सांसद भी इस बहस में सक्रिय रूप से हिस्सा लेने वाले हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रीय गीत एक ऐसी विरासत है जो दलों या विचारधाराओं से परे पूरे देश को एकजुट करती है। कई सांसदों ने कहा है कि यह बहस राष्ट्रीय चेतना की एक सकारात्मक पहल है, जो समाज में राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक समझ को मजबूत करेगी।
‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होना भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण क्षण है। यह सिर्फ गीत की सालगिरह नहीं, बल्कि उस भावना का उत्सव है जिसने देश को स्वतंत्रता के संघर्ष में एकजुट किया। संसद में आज होने वाली बहस आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ेगी कि राष्ट्र का सम्मान उसकी सांस्कृतिक जड़ों से ही गहराता है। प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी और विभिन्न नेताओं के वक्तव्यों से यह चर्चा ऐतिहासिक और यादगार बनना तय है।

