By: Vikash Kumar (Vicky)
देवघर। 23 जनवरी को मनाई जाने वाली बसंत पंचमी को लेकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। बसंत पंचमी मेला का विधिवत आगाज हो चुका है और मिथिला क्षेत्र से आने वाले श्रद्धालुओं का जत्था शुक्रवार रात से ही बाबा धाम पहुंचने लगा है। मिथिला वासी श्रद्धालु सुल्तानगंज से पारंपरिक कांवर के साथ करीब 105 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा तय कर बाबा बैद्यनाथ के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। पूरा देवघर शिवभक्ति, कांवरियों की टोलियों और हर-हर महादेव के जयघोष से भक्तिमय माहौल में डूब गया है।

मिथिला के श्रद्धालुओं के लिए बसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि बाबा बैद्यनाथ से जुड़ी सदियों पुरानी आस्था और परंपरा का प्रतीक है। बसंत पंचमी के दिन बाबा के तिलकोत्सव में शामिल होना मिथिला वासियों का मुख्य उद्देश्य होता है। इसी परंपरा के तहत श्रद्धालु बाबा के लिए अपने साथ विशेष सौगात लेकर आते हैं, जिसे बाबा को अर्पित किया जाता है।
तिलकोत्सव की अनूठी परंपरा
मिथिला से आने वाले श्रद्धालु अपने खेतों की पहली फसल की धान की बाली, शुद्ध घी, आम का मंजर, गुलाल और लड्डू बाबा बैद्यनाथ को चढ़ाते हैं। यह तिलकोत्सव बाबा के विवाहोत्सव से जुड़ा हुआ माना जाता है। तिलकोत्सव के माध्यम से मिथिला वासी बाबा को बारात लेकर आने का न्योता देते हैं। यही कारण है कि बसंत पंचमी के बाद मिथिला क्षेत्र में होली का उत्सव प्रारंभ हो जाता है, जो पूरे एक महीने तक चलता है। मान्यता है कि बाबा धाम से ही मिथिला की होली की शुरुआत होती है। तिलकोत्सव के बाद बाबा बैद्यनाथ और माता पार्वती को नवविवाहित वर-वधू के स्वरूप में मानते हुए फाग गीत गाए जाते हैं और होली खेली जाती है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाई जाती है।
खुले आसमान के नीचे भजन-कीर्तन
शुक्रवार रात से ही मिथिला वासी कांवर लेकर देवघर पहुंचने लगे हैं। शिवगंगा स्थित नेहरू पार्क, देवघर कॉलेज स्टेडियम के समीप और आसपास के अन्य स्थलों पर कांवरियों ने डेरा डाल रखा है। खुले आसमान के नीचे श्रद्धालु भोलेनाथ की भजन-कीर्तन कर रहे हैं और रात्रि विश्राम कर रहे हैं। ठंड के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह और आस्था में कोई कमी नजर नहीं आ रही है। पूरे क्षेत्र में पारंपरिक वेशभूषा, कांवर, भगवा ध्वज और भक्ति गीतों से एक अलग ही आध्यात्मिक वातावरण बन गया है। स्थानीय लोग भी कांवरियों की सेवा में जुटे हुए हैं, जिससे देवघर में मेले जैसा माहौल दिखाई दे रहा है।

37 वर्षों से निभा रहे परंपरा
मोतिहारी और जनकपुर निवासी विनोद बम ने बताया कि वे पिछले 37 वर्षों से लगातार बसंत पंचमी तिलकोत्सव में भाग लेने के लिए बाबा धाम आ रहे हैं। उन्होंने कहा, “यह हम लोगों का सौभाग्य है कि हम मिथिला वासी हैं। हर साल करीब 300 से अधिक श्रद्धालुओं की टोली के साथ बाबा धाम पहुंचते हैं। इस बार भी बड़ी संख्या में लोग पीछे हैं, जिनका हम इंतजार कर रहे हैं।” विनोद बम ने बताया कि बसंत पंचमी के दिन बाबा की विधिवत पूजा-अर्चना कर तिलकोत्सव मनाया जाएगा। इसके बाद इस वर्ष बाबा मंदिर में पूजा के पश्चात अयोध्या जाने की भी योजना है। श्रद्धालुओं के अनुसार, बाबा की कृपा से ही इतनी लंबी यात्रा संभव हो पाती है और हर वर्ष उत्साह और श्रद्धा के साथ यह यात्रा पूरी की जाती है।
प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था
बसंत पंचमी मेला को देखते हुए जिला प्रशासन भी सतर्क है। कांवरियों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन और मूलभूत सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। शिवगंगा, नेहरू पार्क, कॉलेज स्टेडियम सहित अन्य प्रमुख स्थलों पर पुलिस बल और स्वयंसेवकों की तैनाती की गई है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो।
आस्था, परंपरा और संस्कृति का संगम
बसंत पंचमी मेला न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह मिथिला और देवघर की साझा सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है। तिलकोत्सव, फाग गीत, होली की शुरुआत और बाबा को बारात का न्योता, ये सभी परंपराएं मिथिला की समृद्ध संस्कृति को जीवंत बनाती हैं। बाबा बैद्यनाथ धाम में उमड़ती भीड़ यह साबित करती है कि आस्था और परंपरा आज भी लोगों के जीवन में कितनी गहराई से जुड़ी हुई है।
बसंत पंचमी के दिन तिलकोत्सव के साथ यह मेला अपने चरम पर होगा और बाबा धाम शिवभक्ति, उल्लास और रंगों से सराबोर नजर आएगा।

