पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में सस्पेंडेड विधायक हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर 2025 को “बाबरी मस्जिद” जैसा ढांचा बनाने की नींव रखी। इसके बाद ही विवादों ने जोर पकड़ लिया। सिर्फ शिलान्यास नहीं — अब उसके लिए जो चंदा जमा हुआ है, उसने बड़ी सुर्खियाँ बटोरी हैं।

नकद चंदा: 11 ट्रंक, मशीन से गिनती
कबीर के रेजीनगर स्थित घर पर 11 बड़े ट्रंक नकद पाए गए — इतना चंदा कि हाथ से गिनना मुश्किल हो गया। इस कारण चंदा गिनने के लिए मशीन मंगाई गई, और लगभग 30 लोग इस कार्य के लिए नियुक्त किए गए।
कबीर ने दावा किया कि सिर्फ QR-कोड स्कैन से 93 लाख रुपये जमा हुए हैं — हालांकि, ट्रंक में रखा नकद इससे कहीं अधिक हो सकता है।
चंदा कैसे जुटा — ऑनलाइन और नकद दोनों
उनके करीबी सूत्रों के अनुसार, दान के लिए जगह-जगह दान पात्र लगाए गए थे — स्टेनलेस-स्टील चंदा बॉक्स, ऑनलाइन चंदा और ऑफलाइन नकद — और चंदा कुछ ही दिनों में लाखों रुपये में बदल गया। रात भर गिनती चलती रही।
कुछ मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि अब तक लगभग ₹1.3 करोड़ चंदा मिल चुका है।
मकसद और दावे
कबीर का कहना है कि यह चंदा “मुस्लिम समाज की श्रद्धा और एकता” का प्रतीक है — और मस्जिद निर्माण के लिए सरकारी पैसों पर निर्भर नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि पूरा खर्च़ जन चंदे से आएगा।
लेकिन विपक्षी दलों और कुछ धार्मिक-सामाजिक समूहों ने इस कदम को राजनीति से प्रेरित बताया है। उनका मानना है कि नाम, समय और पैसों की बड़ी राशि — सब राजनीतिक संदेश दे रहे हैं।
शिलान्यास और राजनीति: कबीर पर टीएमसी ने लगाई मोहर
6 दिसंबर को शिलान्यास के ऐलान के बाद, उनकी ही पार्टी Trinamool Congress (TMC) ने उन्हें निलंबित कर दिया। पार्टी ने स्पष्ट किया कि यह फैसला उनकी दी गई सीमा रेखा उल्लंघन और पार्टी की नीति के खिलाफ होने के कारण लिया गया।
हालाँकि हुमायूं कबीर न केवल अपना फैसला वापस नहीं ले रहे हैं, बल्कि उन्होंने पहले कहा था कि यदि ज़रूरत पड़ी, तो वह एक नई राजनीतिक पार्टी भी बनाएंगे।
साम्प्रदायिक और राजनीतिक हलचल
मस्जिद के निर्माण के लिए चंदा और शिलान्यास पर न केवल राजनीतिक दल बल्कि धार्मिक-सामाजिक संगठन भी चिंतित हैं। कई लोग इसे “नवां बाबरी मस्जिद विवाद” शुरू करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
विपक्ष में, विभिन्न धार्मिक नेता और वकील — जिन्होंने पहले भी Ayodhya विवाद में भूमिका निभाई — ने हुमायूं कबीर के कदम की आलोचना की है। उनका कहना है कि धर्म-स्थलों को राजनीति की भूख का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
बंगाल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में, जहाँ सामाजिक पहचान और चुनावी समीकरण जटिल हैं — इस मस्जिद निर्माण की पहल से इलाके में साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काने की आशंका जताई जा रही है।
हां — पहली नज़र में यह चंदा-समूह और मस्जिद निर्माण एक धर्म-स्थापना जैसा दिख सकता है। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर चंदा जुटना, नकद ट्रंक, मशीन से गिनती, और साथ में राजनीतिक पृष्ठभूमि — ये सब संकेत दे रहे हैं कि यह केवल धार्मिक पहल नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है।

