By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम यानी POCSO Act के दुरुपयोग को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता जाहिर की है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि वह कानून में ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ (Romeo and Juliet Clause) लाने पर विचार करे, ताकि आपसी सहमति से बने किशोर प्रेम संबंधों को कठोर आपराधिक कार्रवाई से बचाया जा सके।

कोर्ट का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां नाबालिग लड़का-लड़की के सहमति वाले रिश्ते को भी POCSO जैसे सख्त कानून के तहत अपराध मान लिया जाता है। इससे न केवल युवाओं का भविष्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि कानून की मूल भावना पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्या है रोमियो-जूलियट कानून?
‘रोमियो-जूलियट कानून’ कोई भारतीय कानून नहीं है, बल्कि यह एक कानूनी अवधारणा (Legal Principle) है, जिसे अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कई देशों में अपनाया गया है।
इसका मकसद यह है कि कम उम्र के किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने प्रेम या शारीरिक संबंधों को यौन अपराध की श्रेणी में न डाला जाए।
इस क्लॉज के तहत आमतौर पर यह शर्त होती है कि—
दोनों की उम्र में अंतर बहुत अधिक न हो (जैसे 2–3 या 4 साल)
संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बना हो
किसी प्रकार का शोषण, दबाव या हिंसा न हो
ऐसे मामलों में सख्त सजा के बजाय कानूनी छूट या नरमी दी जाती है।
POCSO Act और समस्या की जड़
भारत में POCSO Act 2012 में बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया था। इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति से यौन संबंध अपराध माने जाते हैं, चाहे वह सहमति से ही क्यों न हो।
यही कारण है कि—
16–17 साल की लड़की और 18–19 साल के लड़के के रिश्ते
स्कूल या कॉलेज में बने प्रेम संबंध
घर से भागकर शादी करने वाले किशोर जोड़े
अक्सर POCSO के तहत गंभीर अपराध बन जाते हैं।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में लड़की के माता-पिता द्वारा शिकायत दर्ज कराए जाने पर, पुलिस को मजबूरन POCSO लगाना पड़ता है, भले ही पीड़िता खुद रिश्ते को सहमति वाला बताए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि—
“POCSO जैसे कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना है, न कि किशोरों के सामान्य प्रेम संबंधों को अपराध बनाना।”
कोर्ट ने कहा कि बड़ी संख्या में ऐसे केस सामने आ रहे हैं, जहां कानून का दुरुपयोग हो रहा है और युवा लड़कों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है। इससे उनका करियर, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पूरी तरह बर्बाद हो जाता है।

सरकार को क्या सुझाव दिया गया?
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह—
POCSO में रोमियो-जूलियट क्लॉज जोड़ने पर विचार करे
सहमति से बने किशोर रिश्तों के लिए अलग कानूनी प्रावधान बनाए
सजा तय करते समय उम्र का अंतर और परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि कानून में बदलाव नहीं होता, तो न्यायपालिका को ऐसे मामलों में अलग-अलग व्याख्या करनी पड़ेगी।
NCRB के आंकड़े क्या कहते हैं?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, POCSO के तहत दर्ज मामलों में एक बड़ा प्रतिशत सहमति वाले रिश्तों से जुड़ा होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे—
अदालतों पर बोझ बढ़ता है
असली यौन अपराधों की जांच प्रभावित होती है
कानून की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि—
किशोरावस्था में आकर्षण और प्रेम स्वाभाविक है
हर मामले को अपराध की तरह देखना व्यावहारिक नहीं
रोमियो-जूलियट क्लॉज से कानून और समाज के बीच संतुलन बनेगा
हालांकि कुछ संगठनों का यह भी कहना है कि कानून में ढील से शोषण के मामले छुप सकते हैं, इसलिए बेहद सावधानी के साथ बदलाव किया जाना चाहिए।
अब नजरें केंद्र सरकार पर टिकी हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर क्या कदम उठाती है। यदि POCSO में रोमियो-जूलियट क्लॉज जोड़ा जाता है, तो यह भारतीय आपराधिक कानून में बड़ा सुधार माना जाएगा।
यह बहस साफ तौर पर दिखाती है कि कानून को समय और सामाजिक वास्तविकताओं के अनुसार ढालना कितना जरूरी है।

