बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, राज्य की राजनीति में हलचल तेज होती जा रही है। महागठबंधन के घटक दल—राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस (Congress)—के बीच सीटों को लेकर शुरू हुई तनातनी अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। दोनों दलों के बीच “दोस्ताना मुकाबले” वाली सीटों पर उम्मीदवारों के नाम वापस लेने को लेकर बड़ी चर्चा थी, जिस पर अब जवाब मिल गया है।
दोस्ताना मुकाबले की राजनीति क्या है?
महागठबंधन के अंदर कई ऐसी सीटें हैं, जहां दोनों दलों ने अपने-अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं। इसे ही “दोस्ताना मुकाबला” कहा जा रहा है। मतलब, एक ही गठबंधन के दो दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं।
ऐसी स्थिति पहले भी बिहार में देखने को मिली थी, लेकिन इस बार मामला ज्यादा गंभीर इसलिए है क्योंकि कई सीटें बेहद अहम हैं, जो सीधे सत्ता समीकरणों को प्रभावित कर सकती हैं।
तेजस्वी यादव ने दिया बड़ा बयान
बुधवार को पटना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे पर सफाई दी। उन्होंने कहा,
“हमारे गठबंधन में सबकुछ स्पष्ट है। दोस्ताना मुकाबला कोई विवाद नहीं है। हर पार्टी को अपने राजनीतिक अस्तित्व और मजबूती के लिए फैसले लेने का अधिकार है। अगर कांग्रेस चाहे तो अपने उम्मीदवारों को वापस ले सकती है, लेकिन आरजेडी की ओर से ऐसा कोई कदम फिलहाल नहीं उठाया जाएगा।”
तेजस्वी यादव के इस बयान से यह साफ हो गया कि आरजेडी अपने उम्मीदवारों को दोस्ताना मुकाबले वाली सीटों से नहीं हटाने वाली। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि गठबंधन की एकता बरकरार है और अंतिम फैसला ‘सीट टू सीट’ समीक्षा के बाद लिया जाएगा।
कांग्रेस की नाराज़गी बरकरार
कांग्रेस की ओर से कुछ नेताओं ने आरजेडी के रवैये पर नाराज़गी जताई है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस हाईकमान इस पूरे मुद्दे पर गहन विचार कर रहा है।
कांग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा,
“हम गठबंधन की मर्यादा को समझते हैं, लेकिन कुछ सीटों पर हमारे मजबूत उम्मीदवार हैं। हमसे उम्मीद नहीं की जा सकती कि हम हर बार पीछे हटें। बातचीत जारी है, और जल्द ही स्थिति स्पष्ट होगी।”
किन सीटों पर विवाद सबसे ज्यादा?
जानकारी के अनुसार, पटना सिटी, भागलपुर, दरभंगा, सीवान और गया की कुछ विधानसभा सीटों पर आरजेडी और कांग्रेस दोनों ने अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन सीटों पर अगर महागठबंधन एकजुट नहीं होता, तो एनडीए (BJP+JDU) इसका बड़ा फायदा उठा सकता है। कई सीटों पर दोनों दलों के कार्यकर्ता आमने-सामने आ चुके हैं, जिससे जमीनी स्तर पर भी मतभेद बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
महागठबंधन में सियासी समीकरण बदलने के संकेत
आरजेडी और कांग्रेस के बीच चल रहे इस ठंडे युद्ध से महागठबंधन के भीतर असंतोष बढ़ रहा है। वाम दल (CPI-ML) ने भी इस स्थिति पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि अगर महागठबंधन को सत्ता में वापसी करनी है, तो सीटों पर स्पष्टता और एकजुटता जरूरी है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि “दोस्ताना मुकाबला” वास्तव में गठबंधन की कमजोरी का प्रतीक है। इससे मतों का बिखराव होता है और विपक्ष को फायदा मिलता है।
कांग्रेस का झुकाव ‘अकेले लड़ने’ की दिशा में?
कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी को अब ‘स्वतंत्र रणनीति’ अपनानी चाहिए। उन्हें लगता है कि आरजेडी की बढ़ती एकाधिकारवादी नीति कांग्रेस को नुकसान पहुंचा रही है।
कांग्रेस के अंदर यह चर्चा भी है कि अगर आखिरी समय तक समझौता नहीं हुआ तो पार्टी ‘दोस्ताना मुकाबले’ वाली सीटों पर भी पूरी ताकत से चुनाव लड़ेगी।
आरजेडी की रणनीति क्या है?
आरजेडी के रणनीतिकारों का कहना है कि पार्टी इस बार संगठन स्तर पर काफी मजबूत है और उसे किसी तरह के समझौते की जरूरत नहीं। तेजस्वी यादव चाहते हैं कि पार्टी युवा चेहरों को ज्यादा से ज्यादा मौका दे।
ऐसे में आरजेडी अपनी स्थिति से पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रही है।
विश्लेषकों की राय: नुकसान दोनों को
राजनीति विशेषज्ञ प्रो. अरुण झा का कहना है कि
“अगर महागठबंधन के घटक दलों ने एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा, तो इसका नुकसान दोनों दलों को होगा। इससे विपक्ष को बढ़त मिलेगी, खासकर बीजेपी को।”
उन्होंने कहा कि दोस्ताना मुकाबला भले ही नाम का हो, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि मतदाता भ्रमित हो जाते हैं। इससे गठबंधन की छवि कमजोर होती है।
जनता का रुख क्या कहता है?
जमीन पर जनता इस पूरे घटनाक्रम को बड़ी दिलचस्पी से देख रही है। युवा मतदाता अब सोशल मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं कि अगर गठबंधन के भीतर ही टकराव है, तो वे कैसे भरोसा करें कि ये दल सत्ता में आने पर स्थिर सरकार देंगे?
अंतिम फैसला जल्द संभव
सूत्रों के मुताबिक, अगले सप्ताह महागठबंधन की एक अहम बैठक होने वाली है, जिसमें इस मुद्दे पर अंतिम फैसला लिया जा सकता है। कांग्रेस ने संकेत दिया है कि वह 4–5 सीटों पर ‘दोस्ताना मुकाबला’ समाप्त करने के पक्ष में है, जबकि आरजेडी अभी भी अपने निर्णय पर अडिग है।
बिहार की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर है। जहां एक तरफ महागठबंधन के घटक दल एकजुटता की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर “दोस्ताना मुकाबले” की सियासत उनकी अंदरूनी खींचतान को उजागर कर रही है।
अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में कांग्रेस और आरजेडी अपने मतभेद सुलझा पाते हैं या फिर यह “दोस्ताना मुकाबला” ही भविष्य की बड़ी राजनीतिक जंग की बुनियाद बन जाता है।

