देवघर। त्योहारों और उत्सवों का मौसम आते ही देशभर में उल्लास की लहर दौड़ जाती है। रंग-बिरंगी रोशनियाँ, पटाखों की आवाज़ें, तेज़ संगीत और भीड़भाड़ से सजे बाज़ार — सब मिलकर एक जश्न का माहौल बनाते हैं। लेकिन इन जश्नों की चमक के पीछे जो अंधेरा छिपा है, वह प्रकृति और पर्यावरण के लिए जानलेवा बनता जा रहा है।
प्रकृति हमें जीवन देती है — शुद्ध हवा, स्वच्छ जल, हरियाली और संतुलित तापमान। लेकिन जब उत्सवों के नाम पर हम हवा को प्रदूषित करते हैं, नदियों में कचरा डालते हैं और पेड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, तो वही प्रकृति धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती है। विशेषज्ञों के अनुसार, “उत्सव मनाना गलत नहीं है, लेकिन उसका तरीका अगर असंयमित और असंतुलित हो, तो उसका असर पूरी धरती पर पड़ता है।”
प्रकृति के खिलाफ बढ़ती जश्न संस्कृति
हर साल दिवाली, होली, गणेशोत्सव, दुर्गापूजा, और नए साल के जश्न में लाखों टन कचरा, प्लास्टिक और धुआं पर्यावरण में घुल जाता है। पटाखों से निकलने वाला कार्बन और सल्फर डाइऑक्साइड न सिर्फ हवा को जहरीला बनाता है, बल्कि सांस और हृदय से जुड़ी बीमारियों को भी बढ़ाता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ दिवाली के बाद देश के कई शहरों में वायु गुणवत्ता “गंभीर श्रेणी” में पहुंच जाती है। बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा रोगियों के लिए यह स्थिति खतरनाक होती है।
जल प्रदूषण का बड़ा कारण बनते उत्सव
गणेश विसर्जन या दुर्गा पूजा के बाद मूर्तियों को नदियों में प्रवाहित करने की परंपरा सुंदर मानी जाती है, लेकिन आज की मूर्तियाँ प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंगों से बनती हैं। यह पानी में घुलकर नदियों के जीव-जंतुओं को मार देता है और जल स्रोतों को दूषित कर देता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट के अनुसार, उत्सवों के बाद कई नदियों में ऑक्सीजन स्तर 50 प्रतिशत तक घट जाता है, जिससे मछलियाँ मर जाती हैं और पानी पीने योग्य नहीं रहता।

तेज़ संगीत और ध्वनि प्रदूषण का असर
शहरों में नवरात्र या बारातों के दौरान होने वाला तेज़ डीजे और बैंड-बाजा सिर्फ इंसानों के लिए नहीं, बल्कि जानवरों के लिए भी तनाव का कारण बनता है। पक्षी अपनी दिशा भूल जाते हैं, पालतू जानवर डर के मारे छिप जाते हैं और वन्यजीवों का संतुलन बिगड़ जाता है।
डॉक्टर बताते हैं कि लगातार तेज़ शोर के संपर्क में रहने से हृदय गति बढ़ती है, नींद नहीं आती और मानसिक तनाव बढ़ता है।
कचरे का पहाड़ — उत्सव के बाद का दृश्य
त्योहार खत्म होते ही सड़कों, नदियों और पार्कों में प्लास्टिक, थर्मोकोल, फूल-मालाएँ, गिलास और बोतलों का अंबार लग जाता है। सफाईकर्मी कई दिनों तक इसे हटाने में जुटे रहते हैं, लेकिन प्लास्टिक मिट्टी में सैकड़ों साल तक रहता है।
देवघर, रांची, पटना और वाराणसी जैसे धार्मिक नगरों में कचरा प्रबंधन बड़ी चुनौती बन चुका है।
संयमित खुशी ही सच्चा जश्न है
उत्सव मनाने का अर्थ यह नहीं कि हम प्रकृति को नुकसान पहुंचाएँ। संयमित और पर्यावरण-सम्मत तरीके अपनाकर भी हम उतनी ही खुशी मना सकते हैं। जैसे —
पटाखों की जगह दीयों और फूलों से रोशनी फैलाएं।
पर्यावरण मित्र रंग और मिट्टी की मूर्तियों का प्रयोग करें।
ध्वनि सीमा का पालन करें।
प्लास्टिक की जगह बायोडिग्रेडेबल वस्तुओं का उपयोग करें।
पौधारोपण और स्वच्छता अभियान को भी उत्सव का हिस्सा बनाएं।
सरकार और समाज की भूमिका
सरकार ने हर साल “ग्रीन दिवाली”, “इको फ्रेंडली गणेशोत्सव” और “प्लास्टिक फ्री इंडिया” जैसे अभियान चलाए हैं, लेकिन इनका असर तभी दिखेगा जब आम लोग इन पहलों को अपनाएँगे। स्कूलों और कॉलेजों में पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम चलाना जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस धरती की रक्षा कर सकें।
आखिरी संदेश
प्रकृति, पर्यावरण और दुनिया के लिए उन्मुक्त और अल्हड़ जश्न जानलेवा हो सकता है। खुशियाँ जरूर मनाएँ, लेकिन वह संयमित होनी चाहिए। दीयों की लौ तब ही चमकेगी जब हवा शुद्ध होगी, और फूल तब ही खिलेंगे जब धरती मुस्कुरा सकेगी।
त्योहार हमारी संस्कृति की पहचान हैं, लेकिन पर्यावरण उसकी सांस है। अगर सांस ही बंद हो जाए, तो पहचान किस काम की?

