हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि इनमें दफन हैं शीत युद्ध के वो रहस्य, जिनका खुलासा दशकों बाद हुआ। उत्तराखंड की नंदा देवी चोटी पर आज भी एक ऐसा परमाणु उपकरण दबे होने की आशंका है, जिसे अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA ने चीन पर नजर रखने के लिए भारत के सहयोग से स्थापित करने की कोशिश की थी।

यह कहानी है 1960 के दशक की, जब दुनिया दो ध्रुवों—अमेरिका और सोवियत संघ—में बंटी हुई थी और एशिया में चीन एक नई परमाणु शक्ति के रूप में उभर रहा था।
1965: चीन के परमाणु परीक्षण से अमेरिका में हड़कंप
16 अक्टूबर 1964 को चीन ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। इस घटना ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया। चीन के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर नज़र रखने के लिए CIA को ऐसे स्थान की जरूरत थी, जहां से चीन के भीतर हो रही गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।
हिमालय की ऊंची चोटियां इस लिहाज से आदर्श थीं। खासकर भारत की सीमा से सटे इलाके, जहां से चीन के लोप नूर परमाणु परीक्षण स्थल और मिसाइल गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती थी।
भारत कैसे बना CIA के गुप्त मिशन का हिस्सा?
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत और चीन के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण थे। चीन से संभावित खतरे को देखते हुए भारत ने अमेरिका के साथ खुफिया सहयोग बढ़ाया। इसी पृष्ठभूमि में CIA और भारत की खुफिया एजेंसी के बीच एक गुप्त समझौता हुआ।
इस मिशन में भारत के तत्कालीन खुफिया प्रमुख, वैज्ञानिकों और पर्वतारोहियों की एक विशेष टीम शामिल थी। योजना थी नंदा देवी चोटी पर एक परमाणु ऊर्जा से चलने वाला निगरानी उपकरण (Surveillance Device) स्थापित करने की।
परमाणु एंटीना: क्या था CIA का उपकरण?
CIA का यह उपकरण एक Radioisotope Thermoelectric Generator (RTG) था, जिसमें प्लूटोनियम-238 का इस्तेमाल किया गया था। यह उपकरण बिना बैटरी बदले कई वर्षों तक काम कर सकता था और चीन के मिसाइल लॉन्च, परमाणु परीक्षण और सैन्य संचार को ट्रैक करने में सक्षम था।
इस उपकरण में—
प्लूटोनियम युक्त परमाणु ऊर्जा स्रोत
हाई-फ्रीक्वेंसी एंटीना
डेटा ट्रांसमिशन सिस्टम
शामिल थे, जो सीधे अमेरिकी सैटेलाइट्स को सिग्नल भेजते।
नंदा देवी पर मिशन और अचानक आई तबाही
1965 में CIA और भारतीय टीम ने नंदा देवी पर चढ़ाई शुरू की। हालांकि, अत्यधिक खराब मौसम और भारी बर्फबारी के कारण टीम को मिशन अधूरा छोड़कर लौटना पड़ा।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि परमाणु उपकरण वहीं पहाड़ पर छोड़ दिया गया, ताकि अगली चढ़ाई में उसे स्थापित किया जा सके। लेकिन जब टीम वापस लौटी, तो वह उपकरण गायब था।
माना जाता है कि यह उपकरण हिमस्खलन (Avalanche) के कारण गहरी बर्फ में दब गया।
पर्यावरणीय खतरा और सरकार की चुप्पी
जब यह जानकारी सार्वजनिक हुई, तब वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने गंभीर चिंता जताई। नंदा देवी क्षेत्र कई प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल है, जिनमें गंगा की सहायक नदियां भी शामिल हैं।
आशंका जताई गई कि अगर प्लूटोनियम लीक हुआ, तो यह—
ग्लेशियरों को प्रदूषित कर सकता है
जल स्रोतों को जहरीला बना सकता है
लाखों लोगों के स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है
हालांकि भारत और अमेरिका दोनों ने लंबे समय तक इस मुद्दे पर आधिकारिक चुप्पी बनाए रखी।
क्या आज भी हिमालय में दफन है परमाणु उपकरण?
अब तक उस मूल प्लूटोनियम डिवाइस को पूरी तरह बरामद किए जाने की पुष्टि नहीं हुई है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, बाद में पास की एक अन्य चोटी पर वैकल्पिक उपकरण लगाए गए, लेकिन नंदा देवी वाला उपकरण आज भी बर्फ में दबा हो सकता है।
यह रहस्य आज भी इतिहासकारों, वैज्ञानिकों और सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए एक खुला सवाल बना हुआ है।
शीत युद्ध की विरासत और भारत की रणनीतिक दुविधा
नंदा देवी मिशन भारत के इतिहास का वो अध्याय है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और पर्यावरणीय जोखिम आपस में टकराते हैं। यह घटना दिखाती है कि कैसे शीत युद्ध के दौर में महाशक्तियों की रणनीतियों का असर हिमालय जैसी शांत पर्वत श्रृंखलाओं तक पहुंच गया।
हिमालय की बर्फ सिर्फ प्रकृति का सौंदर्य नहीं, बल्कि इतिहास के खामोश राज़ भी अपने भीतर समेटे हुए है। नंदा देवी मिशन आज भी इस बात की याद दिलाता है कि रणनीतिक फैसलों के दूरगामी परिणाम होते हैं—जो दशकों बाद भी सवाल बनकर सामने आते हैं।
