By: Vikash Kumar (Vicky)
14 जनवरी 2026 का दिन सनातन धर्म को मानने वाले श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास है। इस दिन मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी एक साथ पड़ रही हैं। यह संयोग शुभ तो है, लेकिन व्रत और पर्व के अलग-अलग नियमों के कारण लोगों के मन में भ्रम की स्थिति भी बन रही है। खासतौर पर खिचड़ी के सेवन को लेकर श्रद्धालु असमंजस में हैं।

एकादशी और मकर संक्रांति के नियमों में टकराव
शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत में चावल का सेवन पूर्ण रूप से वर्जित माना गया है। वहीं मकर संक्रांति के दिन चावल और दाल से बनी खिचड़ी खाने और दान करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसे में जब दोनों तिथियां एक साथ पड़ती हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक हो जाता है कि आखिर किस नियम का पालन किया जाए।
पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि का समय
पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी 14 जनवरी 2026 को शाम 5 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इसका अर्थ है कि इस समय तक एकादशी के सभी नियम प्रभावी रहेंगे। जो श्रद्धालु एकादशी का व्रत रख रहे हैं, उन्हें इस अवधि में चावल या चावल से बने किसी भी व्यंजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
एकादशी के बाद खिचड़ी खाने का शास्त्रीय समाधान
ज्योतिषाचार्यों और धर्मशास्त्रों के अनुसार एकादशी तिथि समाप्त होने के बाद मकर संक्रांति के नियमों का पालन किया जा सकता है। यानी शाम 5:52 बजे के बाद खिचड़ी का सेवन और दान करना पूरी तरह से शुभ माना गया है। ऐसा करने से न तो एकादशी व्रत भंग होता है और न ही मकर संक्रांति का पुण्य कम होता है।
त्योहारों पर नियमों की बाध्यता नहीं
कई विद्वानों का मानना है कि सनातन परंपरा में पर्व और त्योहार कठोर नियमों से बंधे नहीं होते। विशेष रूप से मकर संक्रांति जैसे सूर्योपासना से जुड़े पर्व को नियमों से ऊपर रखा गया है। श्रद्धा और भाव को सबसे बड़ा नियम माना गया है, इसलिए जो लोग व्रत नहीं रख रहे हैं, वे बिना किसी चिंता के खिचड़ी का सेवन कर सकते हैं।
मकर संक्रांति का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं। इस दिन प्रातःकाल पवित्र नदी में स्नान, सूर्य को अर्घ्य देना और दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ माना जाता है। तिल, गुड़, चावल, काली उड़द दाल और वस्त्र का दान विशेष पुण्य देता है।

उत्तर भारत में खिचड़ी और दही-चूड़ा की परंपरा
उत्तर भारत के कई राज्यों में मकर संक्रांति पर खिचड़ी पर्व के रूप में मनाई जाती है। वहीं बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दही-चूड़ा खाने की परंपरा भी बेहद लोकप्रिय है। मान्यता है कि इस दिन सात्विक भोजन करने से स्वास्थ्य और सौभाग्य दोनों में वृद्धि होती है।
श्रद्धालुओं के लिए सही निष्कर्ष
यदि आप षटतिला एकादशी का व्रत कर रहे हैं, तो एकादशी तिथि समाप्त होने तक नियमों का पालन करें और उसके बाद मकर संक्रांति के अनुसार खिचड़ी का सेवन व दान करें। वहीं जो श्रद्धालु व्रत नहीं रखते, वे पूरे दिन श्रद्धा के साथ संक्रांति पर्व मना सकते हैं।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं, शास्त्रों और पंचांग पर आधारित है। किसी भी व्रत, पूजा या धार्मिक निर्णय से पहले अपने गुरु, आचार्य या स्थानीय पंचांग की सलाह अवश्य लें।

