By: Vikash Mala Mandal
देवघर। जिला प्रशासन के सख्त निर्देश के बाद देवघर में बाल श्रम के खिलाफ चलाया जा रहा विशेष अभियान अब तेज हो गया है। उपायुक्त सह जिला दंडाधिकारी के निर्देशानुसार 28 मार्च 2026 को बाल श्रम उन्मूलन अभियान के तहत गठित धावा-दल ने एनसीपीसीआर (राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप देवघर – जसीडीह रोड के शहरी क्षेत्र में विभिन्न गैराजों और होटलों का सघन निरीक्षण किया। इस दौरान एक ढाबा से तीन बाल श्रमिकों को मुक्त कराया गया, जिससे प्रशासन की सक्रियता और संवेदनशीलता एक बार फिर सामने आई है।

निरीक्षण के दौरान धावा-दल ने कई प्रतिष्ठानों में अचानक छापेमारी की। टीम के पहुंचते ही कई स्थानों पर हड़कंप मच गया। विशेष रूप से होटल और गैराज जैसे स्थानों को चिन्हित किया गया था, जहां बाल श्रम की संभावना अधिक रहती है। इसी क्रम में शहर के एक ढाबा में कार्यरत तीन नाबालिग बच्चों को चिन्हित कर तुरंत मुक्त कराया गया।

मुक्त कराए गए सभी तीनों बाल श्रमिकों को बाल कल्याण समिति, देवघर के समक्ष प्रस्तुत किया गया। समिति द्वारा आगे की कानूनी प्रक्रिया एवं पुनर्वास की कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है। प्रशासन का कहना है कि इन बच्चों को शिक्षा और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना प्राथमिकता है, ताकि वे दोबारा श्रम के चक्र में न फंसें।
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि बाल श्रम के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। माननीय सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली द्वारा एम. सी. मेहता बनाम राज्य सरकार एवं अन्य के मामले में 10 दिसंबर 1996 को दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के आलोक में बाल श्रमिकों के मामलों में कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। इस निर्णय के अनुसार दोषी नियोक्ताओं से जिला बाल एवं किशोर श्रमिक कोष में 20,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये तक की राशि जमा कराई जा सकती है।

इसके अलावा बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं उन्मूलन) अधिनियम, 1986 तथा संशोधित अधिनियम, 2016 के तहत भी कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। अधिनियम की धारा-3 और 3A के उल्लंघन की स्थिति में धारा-14 के तहत संबंधित नियोक्ता के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है। यह अपराध संज्ञेय श्रेणी में आता है, जिसके तहत दोषी को 20,000 से 50,000 रुपये तक का जुर्माना या 6 महीने से 2 वर्ष तक का कारावास अथवा दोनों सजा दी जा सकती है।
प्रशासन ने यह भी बताया कि बाल श्रम केवल कानून का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकारों का गंभीर हनन भी है। बाल श्रमिकों का शारीरिक और मानसिक विकास बाधित होता है, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए जिले में लगातार जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं।

धावा-दल में श्रम विभाग के विभिन्न प्रखंडों के पदाधिकारी और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे। टीम में श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी, देवघर भूषण यादव, मधुपुर के दिव्यलोक प्रियदर्शी, मोहनपुर के टिंकु कुमार दास, पालोजोरी के दीपक कुमार साव, करौं की किरण बाला शामिल रहे। इसके अलावा एनजीओ आश्रय से आदर्श कुमार यादव और प्रफुल कुमार मंडल, एनजीओ चेतना विकास से नीता पाठक, चाइल्ड हेल्पलाइन के को-ऑर्डिनेटर अनिल पासवान सहित अन्य सदस्य भी अभियान में सक्रिय रूप से शामिल थे।
अभियान के दौरान अधिकारियों ने स्थानीय दुकानदारों और व्यवसायियों को भी सख्त चेतावनी दी कि वे किसी भी परिस्थिति में बाल श्रमिकों को काम पर न रखें। साथ ही आम लोगों से भी अपील की गई कि यदि कहीं बाल श्रम होता हुआ दिखाई दे, तो तुरंत इसकी सूचना प्रशासन या चाइल्ड हेल्पलाइन को दें।

प्रशासन का कहना है कि आने वाले दिनों में इस तरह के अभियान और तेज किए जाएंगे। खासकर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण किया जाएगा, ताकि बाल श्रम जैसी कुप्रथा को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।
देवघर जिला प्रशासन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बाल श्रम के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई गई है और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस कार्रवाई के बाद जिले में अन्य व्यवसायियों के बीच भी सतर्कता बढ़ी है और कई स्थानों पर स्वयं ही बाल श्रमिकों को काम से हटाने की खबरें सामने आ रही हैं।

यह अभियान न केवल कानून के पालन को सुनिश्चित करता है, बल्कि समाज में एक सकारात्मक संदेश भी देता है कि बच्चों का स्थान स्कूल में है, न कि कार्यस्थलों पर। प्रशासन की यह पहल निश्चित रूप से बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

