By: Vikash Mala Mandal
देवघर। चैत्र मास शुक्ल पक्ष की पावन एकादशी, जिसे कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है, के अवसर पर बाबा बैद्यनाथ धाम मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। देश के कोने-कोने से पहुंचे भक्तों ने भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना कर अपने जीवन की मंगल कामनाएं कीं। सुबह से लेकर देर रात तक मंदिर परिसर में धार्मिक आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला।

इस विशेष अवसर पर मंदिर प्रांगण में मुंडन, उपनयन, कथा, हवन और विवाह जैसे कई धार्मिक अनुष्ठान लगातार चलते रहे। श्रद्धालु अपने परिवार के साथ इन अनुष्ठानों को विधि-विधान से संपन्न कराते नजर आए। हालांकि अत्यधिक भीड़ के कारण व्यवस्थाएं कई स्थानों पर चरमराती हुई दिखीं।

मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में काफी अधिक रही। प्रशासन द्वारा भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल की तैनाती की गई थी, लेकिन बढ़ती भीड़ के सामने व्यवस्था कई जगहों पर कमजोर पड़ती दिखी। खासकर मंदिर के वीआईपी गेट और शीघ्र दर्शनम की व्यवस्था को लेकर आम श्रद्धालुओं में नाराजगी देखने को मिली।
जानकारी के अनुसार, सुविधा भवन से शीघ्र दर्शन की कतार को सीधे मंदिर प्रशासनिक भवन के रास्ते प्रवेश कराया जा रहा था, जिससे आम श्रद्धालुओं के लिए दोनों ओर के गेट को बैरियर से बंद कर दिया गया था। इसके कारण मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। कई श्रद्धालु घंटों धूप में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते दिखे।

धार्मिक अनुष्ठान कराने आए लोगों को भी स्थान की कमी का सामना करना पड़ा। सुविधा भवन में पूरी जगह शीघ्र दर्शन की कतार के लिए घेर ली गई थी, जिसके कारण अनुष्ठान करने वाले श्रद्धालुओं को खुले में धूप में बैठकर पूजा करनी पड़ी। यह स्थिति बुजुर्गों और महिलाओं के लिए और भी कठिन रही।
इसके अलावा कतार में खड़े श्रद्धालुओं के लिए पीने के पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से लोग प्यास से भी परेशान नजर आए। कई श्रद्धालुओं ने बताया कि इतनी बड़ी संख्या में भीड़ होने के बावजूद मूलभूत सुविधाओं का अभाव साफ दिखाई दे रहा था।

तीर्थ पुरोहित श्रीनाथ महाराज ने बताया कि कामदा एकादशी का विशेष महत्व है। इस दिन किए गए व्रत और पूजा से सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि कोई व्यक्ति इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजन करता है, तो उसके जीवन की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व बताया था। जब युधिष्ठिर अपने जीवन में कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे थे, तब उन्होंने इस व्रत का पालन किया और उन्हें मनोवांछित फल प्राप्त हुआ। तभी से यह एकादशी “कामदा एकादशी” के रूप में प्रसिद्ध हुई।

मंदिर प्रशासन के अनुसार, देर रात तक लगभग 60 हजार श्रद्धालुओं ने बाबा का जलाभिषेक और पूजा-अर्चना की। भीड़ को देखते हुए प्रशासन द्वारा सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के प्रयास किए गए, लेकिन भविष्य में बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता स्पष्ट रूप से महसूस की गई।

इस दौरान पूरे मंदिर क्षेत्र में भक्ति और आस्था का माहौल बना रहा। “बोल बम” और “हर हर महादेव” के जयकारों से वातावरण गूंजता रहा। श्रद्धालुओं ने कठिनाइयों के बावजूद बाबा के दर्शन कर अपने जीवन को धन्य बताया।

