By: Vikash Kumar (Vicky)

देवघर। देवघर में एम्बुलेंस की बदहाली को लेकर प्रकाशित एक खबर के बाद एक पत्रकार के आवास पर आयकर विभाग की छापेमारी को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। संबंधित पत्रकार ने दावा किया है कि गोड्डा सांसद द्वारा उपलब्ध कराई गई एम्बुलेंस की स्थिति पर समाचार प्रकाशित होने के महज 72 घंटे बाद उनके घर आयकर विभाग की टीम पहुंची। उन्होंने इस कार्रवाई को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला बताते हुए इसे बदले की भावना से प्रेरित बताया है।

पत्रकार के अनुसार, आयकर विभाग की टीम ने उनके आवास पर करीब सात घंटे तक जांच की। इस दौरान उन्होंने और उनके परिवार ने अधिकारियों को पूरा सहयोग दिया तथा विभाग द्वारा मांगे गए सभी दस्तावेज उपलब्ध कराए। उनका कहना है कि जांच के दौरान किसी भी प्रकार की अवैध संपत्ति या संदिग्ध वित्तीय लेन-देन नहीं मिला, जिससे उनका पक्ष और मजबूत हुआ है।

पत्रकार ने जारी अपने विस्तृत बयान में कहा कि उन्होंने हाल ही में एक समाचार प्रकाशित किया था, जिसमें गोड्डा सांसद Nishikant Dubey के निजी फंड से उपलब्ध कराई गई एम्बुलेंस की तकनीकी खराबी और कथित प्रशासनिक लापरवाही को प्रमुखता से उठाया गया था। उनका आरोप है कि इसी खबर के तीन दिन बाद केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई हुई, जिसे वह महज संयोग नहीं मानते।

उन्होंने कहा कि यदि जनता के स्वास्थ्य के लिए उपलब्ध कराई गई एम्बुलेंस कुछ ही दिनों में धुआं छोड़ने लगे या खराब हो जाए, तो उस पर सवाल उठाना पत्रकारिता का दायित्व है। उनके अनुसार जनहित से जुड़े ऐसे मुद्दों को उठाना लोकतंत्र की मूल भावना का हिस्सा है और इस प्रकार की कार्रवाई से पत्रकारों को डराया नहीं जा सकता।

अपने बयान में पत्रकार ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि सांसद का धन्यवाद, क्योंकि इस कार्रवाई के बाद वह समाज के सामने पूरी तरह साफ-सुथरे साबित हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश के वरिष्ठ अधिकारियों का बहुमूल्य समय ऐसे मामलों में लगाने के बजाय बड़े मामलों की जांच में लगाया जाना चाहिए।

पत्रकार ने यह भी सवाल उठाया कि जांच एजेंसियों का रुख बार-बार उन लोगों की ओर ही क्यों होता है जो जनहित के मुद्दों को सामने लाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि देश में कानून सबके लिए समान है तो जनप्रतिनिधियों की संपत्ति और वित्तीय मामलों की भी समान रूप से निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने राज्य सरकार और केंद्र सरकार से मांग की कि जनप्रतिनिधियों की संपत्ति की भी पारदर्शी जांच कराई जाए, ताकि जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास और मजबूत हो।

उन्होंने दावा किया कि खबर के प्रकाशन और केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई के बीच मात्र 72 घंटे का अंतर इस पूरे घटनाक्रम की “क्रोनोलॉजी” को दर्शाता है। उनके अनुसार यह कार्रवाई एम्बुलेंस की बदहाली जैसे मूल मुद्दे से जनता का ध्यान हटाने का प्रयास हो सकती है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
पत्रकार ने कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़ा विषय है। यदि जनहित के सवाल उठाने वाले पत्रकारों पर दबाव बनाया जाएगा तो इसका असर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में भी पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सच को सामने लाना ही रहेगा।

अपने बयान में उन्होंने एम्बुलेंस की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि एम्बुलेंस कोई सामान्य वाहन नहीं बल्कि मरीजों के जीवन और मृत्यु से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण सेवा है। यदि नई एम्बुलेंस भी कुछ दिनों में खराब हो जाती है तो इसकी गुणवत्ता, खरीद प्रक्रिया और रखरखाव की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने संबंधित एजेंसियों से पूरे मामले का तकनीकी ऑडिट कराने की मांग की।
फिलहाल आयकर विभाग की ओर से इस छापेमारी को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। वहीं सांसद की ओर से भी पत्रकार के आरोपों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में पत्रकार द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि शेष है।

यह घटनाक्रम देवघर में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर पत्रकार इसे प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आधिकारिक पक्ष सामने आने का इंतजार किया जा रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि संबंधित एजेंसियां इस पूरे मामले पर क्या स्पष्टीकरण देती हैं और एम्बुलेंस की गुणवत्ता तथा खरीद प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।
