By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
नई दिल्ली। भारत अपनी वायु शक्ति को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा रहा है। फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की प्रक्रिया इन दिनों तेजी से आगे बढ़ रही है। फ्रांसीसी विमान निर्माता कंपनी Dassault Aviation ने भारत के प्रस्ताव के जवाब में तकनीकी और व्यावसायिक प्रस्ताव पेश किया है। इस पूरी डील की अनुमानित कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। हालांकि, अभी इसे अंतिम खरीद समझौता नहीं माना जा सकता, क्योंकि कीमत, शर्तों और अन्य प्रक्रियाओं पर बातचीत के बाद अंतिम मंजूरी की जरूरत होगी।

क्यों जरूरी हैं 114 नए राफेल?
भारत की वायुसेना लंबे समय से लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही है। भारतीय वायुसेना की स्वीकृत स्क्वाड्रन क्षमता की तुलना में मौजूदा संख्या कम है और कई पुराने लड़ाकू विमान धीरे-धीरे सेवा से बाहर हो रहे हैं। ऐसे समय में आधुनिक मल्टी-रोल फाइटर जेट्स की जरूरत बढ़ गई है। राफेल को 4.5 पीढ़ी का अत्याधुनिक लड़ाकू विमान माना जाता है। यह हवा से हवा में मार करने के साथ-साथ हवा से जमीन पर हमला, सटीक बमबारी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी कई भूमिकाएं निभा सकता है। यही बहुउद्देश्यीय क्षमता इसे भारतीय वायुसेना के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।

भारत के पास अभी कितने राफेल?
भारत ने पहले फ्रांस से 36 राफेल विमानों की खरीद की थी। ये विमान भारतीय वायुसेना में शामिल होकर अंबाला और हाशिमारा जैसे एयरबेस से ऑपरेट कर रहे हैं। इसके अलावा भारतीय नौसेना के लिए 26 Rafale-M विमानों की खरीद का समझौता भी हो चुका है। यदि 114 अतिरिक्त राफेल का प्रस्ताव अंतिम रूप लेता है तो भारत के पास एयरफोर्स और नेवी को मिलाकर राफेल विमानों का बड़ा बेड़ा होगा। इससे भारत की हवाई और समुद्री युद्ध क्षमता में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हो सकती है।

114 राफेल डील में क्या है खास?
इस प्रस्ताव की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ विमानों की संख्या नहीं, बल्कि भारत में इनके निर्माण पर दिया जा रहा जोर है। रिपोर्टों के मुताबिक 114 विमानों में बड़ी संख्या में राफेल भारत में बनाए या असेंबल किए जाने की योजना है। इससे यह डील केवल हथियार खरीद तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भारत के एयरोस्पेस और रक्षा उत्पादन क्षेत्र को भी बढ़ावा दे सकती है। सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की नीति के तहत स्थानीय निर्माण, तकनीक और भारतीय उद्योग की भागीदारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य भविष्य में लड़ाकू विमानों और उनके रखरखाव के लिए विदेशी निर्भरता को कम करना भी है।

चीन और पाकिस्तान के मोर्चे पर बढ़ेगी क्षमता
भारत की सुरक्षा चुनौतियां केवल एक दिशा से नहीं हैं। पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान और उत्तरी सीमा पर चीन के साथ लंबे समय से रणनीतिक और सैन्य चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में वायुसेना के पास पर्याप्त संख्या में आधुनिक लड़ाकू विमानों का होना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। राफेल की लंबी दूरी की मारक क्षमता, आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और विभिन्न प्रकार के हथियारों को इस्तेमाल करने की क्षमता इसे रणनीतिक रूप से उपयोगी बनाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक नए राफेल भारतीय वायुसेना को अलग-अलग परिस्थितियों में तेजी से कार्रवाई करने की क्षमता दे सकते हैं।

पुराने विमानों की जगह आधुनिक फाइटर जेट
भारतीय वायुसेना के सामने एक बड़ी चुनौती पुराने लड़ाकू विमानों को धीरे-धीरे हटाने की भी है। मिग-21 जैसे पुराने विमान अब सेवा से बाहर हो चुके हैं, जबकि अन्य पुराने प्लेटफॉर्म भी आने वाले वर्षों में चरणबद्ध तरीके से हटाए जाएंगे। दूसरी तरफ स्वदेशी तेजस और भविष्य में आने वाले तेजस Mk2 तथा AMCA जैसे कार्यक्रमों पर भी काम चल रहा है। लेकिन इन विमानों की पर्याप्त संख्या में उपलब्धता में समय लग सकता है। ऐसे में राफेल जैसे पहले से ऑपरेशनल और युद्ध-परीक्षित विमान अंतरिम अवधि में क्षमता की कमी को पूरा करने में मदद कर सकते हैं।

भारत में बनेंगे ज्यादातर राफेल?
प्रस्ताव से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार 114 विमानों में बड़ी संख्या भारत में निर्माण/असेंबली के लिए रखी गई है। India Today की रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस ने 114 में से 94 राफेल भारत में बनाने का प्रस्ताव दिया है। यह कदम भारतीय रक्षा उद्योग के लिए बड़ा अवसर माना जा रहा है। भारत में उत्पादन बढ़ने से स्थानीय कंपनियों को एयरोस्पेस सप्लाई चेन में भागीदारी का मौका मिल सकता है। इससे कुशल रोजगार, तकनीकी क्षमता और रक्षा निर्माण का इकोसिस्टम विकसित होने की उम्मीद है।

कीमत और अंतिम मंजूरी अभी बाकी
114 राफेल की प्रस्तावित डील की कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। इतनी बड़ी रक्षा खरीद के लिए कीमत, हथियार पैकेज, रखरखाव, तकनीकी सहयोग, स्थानीय निर्माण और डिलीवरी टाइमलाइन जैसे कई मुद्दों पर बातचीत जरूरी होगी। रक्षा अधिग्रहण परिषद ने फरवरी 2026 में इस खरीद की आवश्यकता को मंजूरी दी थी। अब आगे की प्रक्रिया में बातचीत और अन्य औपचारिकताओं के बाद अंतिम निर्णय Cabinet Committee on Security यानी CCS के स्तर पर होना है।

कब तक मिल सकते हैं नए राफेल?
यह डील अंतिम रूप लेने के बाद भी सभी 114 विमान तुरंत भारत नहीं पहुंचेंगे। इतनी बड़ी संख्या में आधुनिक लड़ाकू विमानों का उत्पादन और डिलीवरी चरणबद्ध तरीके से होगी। भारत में निर्माण की व्यवस्था तैयार करने में भी समय लगेगा। इसलिए इस खरीद का असर तत्काल पूरी क्षमता में दिखाई देने के बजाय आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे देखने को मिलेगा। वहीं भारत के लिए यह सौदा लंबे समय की वायु शक्ति रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

कुल मिलाकर 114 राफेल की प्रस्तावित खरीद भारत की रक्षा नीति में बड़ा कदम हो सकती है। इसकी जरूरत का सबसे बड़ा कारण वायुसेना की लड़ाकू स्क्वाड्रनों की कमी, पुराने विमानों का चरणबद्ध रिटायरमेंट और चीन-पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर मजबूत हवाई क्षमता बनाए रखना है।

राफेल के अलावा भारत स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों पर भी जोर दे रहा है। ऐसे में 114 राफेल की संभावित डील को तत्काल जरूरत और दीर्घकालिक रणनीति के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, अंतिम कीमत, शर्तों और डिलीवरी की जानकारी तभी स्पष्ट होगी जब भारत और फ्रांस के बीच औपचारिक समझौता अंतिम रूप लेगा।

