By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने महाराष्ट्र की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम शामिल नहीं होने को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राहुल गांधी ने चुनाव आयोग को ‘वोट चोरी आयोग’ तक कह दिया और आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बदलाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।

राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब महाराष्ट्र में SIR के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 2.07 करोड़ मतदाताओं के नाम शामिल नहीं हो पाए हैं। चुनाव अधिकारियों के मुताबिक, महाराष्ट्र की पिछली मतदाता सूची में करीब 9.78 करोड़ मतदाता थे, जबकि SIR के बाद जारी ड्राफ्ट सूची में लगभग 7.72 करोड़ मतदाता शामिल हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि अंतिम मतदाता सूची से सभी नाम स्थायी रूप से हटा दिए गए हैं।
राहुल गांधी ने क्या सवाल उठाए?
राहुल गांधी ने महाराष्ट्र की अलग-अलग चुनावी सूचियों में मतदाताओं की संख्या में आए बदलाव को लेकर सवाल किया। उनका कहना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान महाराष्ट्र में करीब 9.29 करोड़ मतदाता थे, जबकि उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में यह संख्या बढ़कर करीब 9.7 करोड़ हो गई। अब SIR के बाद ड्राफ्ट सूची में मतदाताओं की संख्या करीब 7.8 करोड़ रह गई है। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि आखिर इन अलग-अलग आंकड़ों में सही मतदाता सूची कौन सी थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच महाराष्ट्र में करीब 39 लाख नए मतदाता जुड़े थे और अब SIR के बाद दो करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं दिखाई दे रहे हैं।

राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक हमले को और तीखा करते हुए चुनाव आयोग को ‘वोट चोरी आयोग’ कहा। उनका आरोप है कि BJP और चुनाव आयोग अपनी रणनीति बदलते रहते हैं, लेकिन उनका लक्ष्य किसी भी कीमत पर BJP की जीत सुनिश्चित करना और लोकतंत्र को कमजोर करना है। हालांकि, ये राहुल गांधी और कांग्रेस के राजनीतिक आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि के तौर पर चुनाव आयोग ने कोई निष्कर्ष स्वीकार नहीं किया है।
क्या है SIR और क्यों हो रही है चर्चा?
SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची को अपडेट और सत्यापित करने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची में पात्र नागरिकों के नाम सुनिश्चित करना तथा मृत, स्थान बदल चुके, डुप्लीकेट या अन्य कारणों से अपात्र हो चुके नामों की पहचान करना है। महाराष्ट्र में अधिकारियों के मुताबिक, जिन मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हो सके, उसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें मतदाता का अपने पते पर नहीं मिलना, पता बदल लेना, मृत्यु हो जाना, डुप्लीकेट या एक से अधिक स्थानों पर पंजीकरण होना तथा अन्य कारण शामिल हैं। यही वजह है कि ड्राफ्ट मतदाता सूची को अंतिम सूची नहीं माना जाता। पात्र मतदाताओं को अपने नाम से जुड़ी आपत्ति या दावा दर्ज कराने का अवसर दिया जाता है। महाराष्ट्र के मामले में अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर को प्रकाशित किए जाने का चुनाव आयोग का कार्यक्रम बताया गया है।

दिल्ली को लेकर भी कांग्रेस ने उठाए सवाल
महाराष्ट्र के अलावा कांग्रेस ने दिल्ली की मतदाता सूची में हुए बदलाव को लेकर भी चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने दावा किया कि दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम जोड़े गए थे और अब ड्राफ्ट सूची तैयार करते समय बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं। खरगे ने दावा किया कि दिल्ली में 47 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर किए गए हैं और 30 लाख से अधिक लोगों को नोटिस भेजे जाने की तैयारी है। कांग्रेस ने इन आंकड़ों के आधार पर चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाया है। हालांकि, ऐसे दावों को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि ड्राफ्ट सूची और अंतिम मतदाता सूची में अंतर होता है। किसी नाम का ड्राफ्ट सूची में नहीं होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित मतदाता का नाम स्थायी रूप से हटा दिया गया है।

चुनाव आयोग पर राहुल गांधी के बयान को कैसे देखें?
राहुल गांधी का ‘वोट चोरी आयोग’ वाला बयान बेहद राजनीतिक और आक्रामक है। लोकतंत्र में विपक्ष का चुनाव आयोग से सवाल पूछना और मतदाता सूची में गड़बड़ी की शिकायत उठाना पूरी तरह महत्वपूर्ण मुद्दा है। अगर किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से सूची से बाहर हो गया है, तो उसे सुधारने की व्यवस्था पारदर्शी और आसान होनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ, चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोप लगाने के लिए ठोस और सत्यापित प्रमाण भी जरूरी हैं। केवल मतदाताओं की संख्या में बदलाव को देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि चुनाव में जानबूझकर वोट चोरी हुई, अपने आप में पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रशासनिक कारणों से भी मतदाता सूची में बड़े बदलाव हो सकते हैं। महाराष्ट्र के अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए मतदाताओं के पीछे अनुपलब्धता, पता बदलना, मृत्यु, डुप्लीकेट पंजीकरण और अन्य कारण शामिल हैं। इसलिए पूरे मामले का अंतिम आकलन दावे-आपत्तियों और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद ज्यादा स्पष्ट हो सकता है।

आरोप-प्रत्यारोप के बीच असली सवाल मतदाता का अधिकार
SIR को लेकर राजनीतिक विवाद चाहे जितना बढ़े, सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा आम मतदाता का अधिकार है। किसी भी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में होना और उसे मतदान का अधिकार मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है। ऐसे में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाए, नाम हटाने के कारण सार्वजनिक किए जाएं और पात्र नागरिकों को दावा-आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर मिले। वहीं राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे गंभीर आरोपों के साथ ठोस तथ्य और प्रमाण जनता के सामने रखें।

राहुल गांधी के ‘वोट चोरी आयोग’ वाले बयान ने एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची की विश्वसनीयता को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। फिलहाल महाराष्ट्र की ड्राफ्ट सूची को अंतिम सूची नहीं माना जा सकता। आने वाले समय में दावे-आपत्तियों और अंतिम मतदाता सूची से यह स्पष्ट होगा कि कितने नाम वास्तव में हटते हैं, कितने वापस जुड़ते हैं और SIR के बाद मतदाता सूची में अंतिम बदलाव कितना रहता है।

इस पूरे विवाद में सबसे अहम बात यही है कि राजनीतिक आरोपों से अलग हर पात्र नागरिक का नाम सही मतदाता सूची में दर्ज हो और उसे बिना किसी बाधा के मतदान का अधिकार मिले। यही चुनावी लोकतंत्र की विश्वसनीयता का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।


