By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
भारत और चीन के रिश्तों को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक स्तर पर महत्वपूर्ण बयान सामने आया है। चीन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्र विदेश नीति से जुड़े संदेश का स्वागत किया है। चीन की ओर से कहा गया है कि भारत और चीन के बीच संबंध किसी तीसरे देश के प्रभाव या दबाव में नहीं होने चाहिए। चीन के इस बयान को दोनों देशों के बीच संबंधों को लेकर एक अहम कूटनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता यानी Strategic Autonomy पर जोर देती रही है। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग देशों के साथ स्वतंत्र रूप से संबंध विकसित करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई मौकों पर यह संदेश दे चुके हैं कि भारत किसी एक खेमे की विदेश नीति का हिस्सा बनने के बजाय अपने हितों के आधार पर फैसले लेता है।

चीन ने क्या कहा?
चीन की ओर से भारत-चीन संबंधों को लेकर यह बात ऐसे समय में सामने आई है, जब वैश्विक स्तर पर अमेरिका, चीन, रूस और अन्य बड़ी शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। चीन का कहना है कि भारत और चीन जैसे दो बड़े पड़ोसी देशों के बीच रिश्तों को किसी तीसरे देश के प्रभाव से प्रभावित नहीं होना चाहिए। चीन के इस रुख को भारत की उस विदेश नीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है, जिसमें नई दिल्ली एक साथ कई प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाती है। भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत कर रहा है, वहीं रूस के साथ भी उसके पुराने और महत्वपूर्ण संबंध बने हुए हैं। इसके अलावा भारत चीन के साथ भी सीमा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर संवाद जारी रखने की कोशिश करता रहा है।

PM मोदी की स्वतंत्र विदेश नीति का संदेश क्यों महत्वपूर्ण?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को लगातार प्राथमिकता दी है। भारत कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार रुख अपनाता है। यही वजह है कि भारत को अक्सर ऐसी शक्ति के रूप में देखा जाता है, जो अलग-अलग देशों के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है। यूक्रेन संकट से लेकर पश्चिम एशिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र तक भारत ने कई मुद्दों पर अपना स्वतंत्र रुख रखा है। भारत का जोर इस बात पर रहा है कि विदेश नीति किसी दबाव के आधार पर नहीं बल्कि देश के राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और आर्थिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर तय की जानी चाहिए।
ऐसे में चीन द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्र विदेश नीति के संदेश का स्वागत करना अपने आप में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत-चीन संबंधों में क्यों आया था तनाव?
भारत और चीन दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और पड़ोसी देश हैं। दोनों देशों के बीच व्यापारिक और आर्थिक संबंध काफी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, सीमा विवाद के कारण दोनों देशों के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में तनाव देखने को मिला है। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर सैन्य तनाव ने भारत-चीन संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई दौर की बातचीत हुई। भारत लगातार सीमा पर शांति और स्थिरता को सामान्य द्विपक्षीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण मानता रहा है। भारत का रुख रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना दोनों देशों के संबंधों को पूरी तरह सामान्य करना मुश्किल होगा। वहीं चीन भी दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग को आगे बढ़ाने की बात करता रहा है।

तीसरे देश का मुद्दा क्यों अहम?
भारत और चीन के बीच तीसरे देश का मुद्दा मुख्य रूप से अमेरिका और व्यापक इंडो-पैसिफिक रणनीति के संदर्भ में देखा जाता है। अमेरिका और भारत के बीच रक्षा, तकनीक, व्यापार और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ा है। दूसरी तरफ चीन और अमेरिका के बीच वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है। चीन अक्सर भारत-अमेरिका के बढ़ते रणनीतिक संबंधों को लेकर अपनी चिंता जाहिर करता रहा है। ऐसे में चीन की ओर से यह कहना कि भारत-चीन संबंध किसी तीसरे देश से प्रभावित नहीं होने चाहिए, एक तरह से नई दिल्ली के साथ सीधे द्विपक्षीय संबंधों पर जोर देने का संकेत माना जा सकता है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत अपने अन्य देशों के साथ संबंधों को कम करने जा रहा है। भारत की विदेश नीति का मूल आधार ही बहु-आयामी संबंध और रणनीतिक स्वायत्तता है।

क्या इससे भारत-चीन रिश्तों में सुधार की उम्मीद बढ़ेगी?
चीन के बयान को सकारात्मक कूटनीतिक संकेत जरूर माना जा सकता है, लेकिन भारत-चीन संबंधों में वास्तविक सुधार कई मुद्दों पर निर्भर करेगा। इनमें सबसे प्रमुख सीमा पर शांति और स्थिरता, सैन्य तनाव कम करना, आपसी विश्वास बहाल करना और व्यापारिक संबंधों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। भारत के लिए सीमा सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में से एक है। इसलिए केवल बयानबाजी से रिश्तों में पूरी तरह बदलाव नहीं आएगा। दोनों देशों के बीच जमीनी स्तर पर भरोसा बढ़ाने के लिए लगातार संवाद और ठोस कदमों की जरूरत होगी। अगर भारत और चीन सीमा विवाद से जुड़े लंबित मुद्दों को शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाने में सफल होते हैं और दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल होता है, तो इसका असर व्यापार और आर्थिक सहयोग पर भी पड़ सकता है।

चीन के बयान को कैसे देखा जाए?
कुल मिलाकर चीन द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वतंत्र विदेश नीति से जुड़े संदेश का स्वागत करना एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम है। इससे यह संकेत मिलता है कि चीन भी भारत के साथ अपने संबंधों को सीधे तौर पर आगे बढ़ाने की आवश्यकता को समझता है।
भारत के लिए यह स्थिति अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए सभी प्रमुख शक्तियों के साथ राष्ट्रीय हित के आधार पर संबंध मजबूत करने का अवसर देती है। भारत अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और अन्य देशों के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाते हुए चीन के साथ भी संवाद जारी रख सकता है।

हालांकि, भारत-चीन संबंधों की दिशा केवल बयानों से तय नहीं होगी। सीमा पर शांति, आपसी विश्वास, व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर दोनों देशों के वास्तविक कदम आने वाले समय में ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे।
ऐसे में चीन का यह बयान फिलहाल एक सकारात्मक कूटनीतिक संकेत जरूर है, लेकिन इसे भारत-चीन संबंधों में बड़े बदलाव की शुरुआत मानने से पहले दोनों देशों के बीच आगे होने वाली बातचीत और जमीनी स्तर पर उठाए जाने वाले कदमों पर नजर रखना जरूरी होगा।

