By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
भारत में डिजिटल पेमेंट का सबसे बड़ा माध्यम बन चुके UPI को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने UPI के Merchant Discount Rate यानी MDR को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राहुल गांधी का कहना है कि सरकार ने अमेरिकी पेमेंट कंपनियों के दबाव में UPI की मौजूदा Zero-MDR व्यवस्था में बदलाव का रास्ता खोल दिया है। उनका दावा है कि इसका असर आगे चलकर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।

दरअसल, UPI को लेकर हाल में सरकार की ओर से किए गए कानूनी बदलाव के बाद यह बहस शुरू हुई है कि क्या भविष्य में कुछ बड़े Merchant UPI Transactions पर MDR लगाया जा सकता है। 15 सितंबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार और भुगतान क्षेत्र से जुड़े संस्थानों के बीच 2,000 रुपये से अधिक के कुछ Merchant Transactions पर शुल्क की संभावनाओं को लेकर चर्चा चल रही है। Reuters के अनुसार, संभावित शुल्क करीब 0.4 प्रतिशत हो सकता है, हालांकि इस पर अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।
राहुल गांधी ने क्या आरोप लगाया?
राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि UPI की Zero-MDR व्यवस्था में बदलाव के पीछे अमेरिकी पेमेंट कंपनियों का दबाव हो सकता है। उनका तर्क है कि यदि दुकानदारों या कारोबारियों पर MDR का खर्च बढ़ता है तो व्यापारी किसी न किसी तरीके से यह लागत सामान और सेवाओं की कीमतों में जोड़ सकते हैं। ऐसे में अप्रत्यक्ष रूप से इसका बोझ ग्राहकों तक पहुंचने की आशंका है। कांग्रेस ने इस मुद्दे को सिर्फ डिजिटल पेमेंट की फीस का मामला नहीं बताया है, बल्कि इसे आर्थिक नीति और भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़कर देखा है। कांग्रेस नेताओं की ओर से यह सवाल भी उठाया गया है कि UPI जैसी भारतीय डिजिटल व्यवस्था को विदेशी कंपनियों के हितों से प्रभावित क्यों होने दिया जाए।

MDR क्या होता है?
Merchant Discount Rate यानी MDR वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी के लेनदेन से जुड़ा होता है। इसे आम तौर पर पेमेंट इकोसिस्टम में शामिल बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और अन्य संस्थाओं के बीच बांटा जाता है। UPI के मामले में लंबे समय से Zero-MDR व्यवस्था लागू रही है। इसका मतलब यह रहा कि सामान्य UPI Merchant Payment पर व्यापारी से MDR नहीं लिया जाता था। सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए इस व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना है। अप्रैल 2025 में सरकार ने भी स्पष्ट किया था कि UPI Transactions पर MDR नहीं लिया जा रहा है और इसलिए इन लेनदेन पर MDR से जुड़ा GST भी लागू नहीं होता।

अब बदलाव की चर्चा क्यों?
2026 में UPI के लेनदेन का आकार और संख्या काफी बढ़ गई है। इतनी बड़ी डिजिटल पेमेंट व्यवस्था को चलाने के लिए बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड प्रिवेंशन और तकनीकी अपग्रेड पर लगातार खर्च होता है। सरकार ने अगस्त 2026 में स्पष्ट किया था कि UPI Users से कोई Transaction Charge नहीं लिया जाएगा। सरकार के मुताबिक भविष्य में अगर MDR लागू किया भी जाता है तो वह केवल एक सीमित श्रेणी के Merchant Transactions पर, एक तय सीमा से ऊपर और मामूली दर पर लागू हो सकता है। साथ ही Person-to-Person यानी P2P UPI Transactions मुफ्त रहने की बात कही गई है। वित्त मंत्रालय की ओर से यह भी कहा गया कि संभावित MDR क्रेडिट और डेबिट कार्ड के MDR की तुलना में काफी कम होगा और सभी Merchant Transactions पर इसे लागू करने की योजना नहीं है।

2,000 रुपये की सीमा को लेकर क्या स्थिति है?
15 सितंबर 2026 की जानकारी के अनुसार, 2,000 रुपये तक के UPI Payments पर बैंक या सिस्टम प्रोवाइडर द्वारा सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से शुल्क लगाने पर रोक स्पष्ट की गई है। यानी सामान्य ग्राहकों के छोटे UPI Payments को लेकर तत्काल शुल्क की स्थिति नहीं बनी है। विवाद मुख्य रूप से 2,000 रुपये से अधिक के Merchant Transactions को लेकर है। सरकार ने पहले ही कहा है कि भविष्य में MDR लागू करने की स्थिति में यह सीमित और Threshold-based हो सकता है। हालांकि, वास्तविक दर, किन कारोबारियों पर लागू होगी और शुल्क से मिलने वाली राशि किस तरह बांटी जाएगी, इन विषयों पर अंतिम व्यवस्था महत्वपूर्ण होगी।

क्या आम ग्राहक की जेब पर असर पड़ेगा?
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। सरकार का कहना है कि ग्राहक से UPI Payment करने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। यानी QR Code स्कैन करके दुकानदार को पैसे भेजने वाले व्यक्ति से अलग से UPI Charge लेने की बात नहीं है। दूसरी तरफ, कांग्रेस का तर्क है कि यदि व्यापारियों की लागत बढ़ती है तो वे भविष्य में सामान या सेवाओं की कीमत बढ़ाकर उसका कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूल सकते हैं। इसलिए कांग्रेस इसे अप्रत्यक्ष रूप से Consumer Cost से जोड़ रही है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि MDR लागू होने की स्थिति में हर ग्राहक को अतिरिक्त भुगतान करना ही पड़ेगा। इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि MDR की दर कितनी तय होती है, किन Merchant Transactions पर लागू होती है और व्यापारी इस लागत को किस तरह संभालते हैं।

अमेरिकी दबाव के आरोप को कैसे देखा जाए?
राहुल गांधी का “अमेरिकी दबाव” वाला आरोप फिलहाल एक राजनीतिक दावा है। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में सरकार ने UPI शुल्क व्यवस्था में बदलाव को अमेरिकी कंपनियों के दबाव का परिणाम नहीं बताया है। इसके बजाय सरकार ने UPI Ecosystem की Financial Sustainability, Infrastructure, Cybersecurity और बढ़ती लागत को संभावित बदलाव के पीछे प्रमुख कारण बताया है। इसलिए इस पूरे मामले को समझते समय दो बातों को अलग-अलग देखना जरूरी है। पहली, क्या भविष्य में कुछ बड़े Merchant UPI Transactions पर MDR लागू हो सकता है? मौजूदा चर्चाओं के आधार पर इसकी संभावना खुली हुई है। दूसरी, क्या यह बदलाव अमेरिकी कंपनियों के दबाव में किया जा रहा है? इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।

UPI पर आगे क्या होगा?
UPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। जुलाई 2026 में UPI ने 2,366 करोड़ Transactions किए थे, जिनकी कुल वैल्यू करीब 29.9 लाख करोड़ रुपये रही। सरकार के अनुसार UPI अब कई देशों में भी उपलब्ध है और भारत इसे वैश्विक डिजिटल पेमेंट मॉडल के तौर पर आगे बढ़ा रहा है। ऐसे में MDR को लेकर होने वाला कोई भी फैसला सिर्फ बैंकों और Payment Companies को प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि करोड़ों दुकानदारों और डिजिटल भुगतान करने वाले लोगों पर भी असर डाल सकता है।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि UPI Users के लिए सामान्य भुगतान पर शुल्क लगाने की बात सरकार ने खारिज की है। विवाद मुख्य रूप से भविष्य में कुछ चुनिंदा बड़े Merchant Transactions पर MDR लागू करने की संभावना को लेकर है। राहुल गांधी इसे अमेरिकी दबाव से जोड़ रहे हैं, जबकि सरकार इसे UPI Ecosystem को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है।
इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि UPI पर आम जनता के लिए शुल्क लागू हो गया है। असली तस्वीर MDR की अंतिम दर, सीमा और लागू होने वाले नियम तय होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

