By: Mala Mandal
रांची। दुर्गा पूजा की आहट के साथ ही झारखंड की राजधानी रांची में मां दुर्गा के स्वागत की तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं। शहर के अलग-अलग इलाकों में पूजा पंडालों को आकर्षक और भव्य रूप देने के लिए कारीगर दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। इसी बीच रांची के बिरला मैदान से सामने आई एक तस्वीर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। यह तस्वीर सिर्फ दुर्गा पूजा की तैयारी की नहीं, बल्कि हौसले, मेहनत और कभी हार न मानने वाले जज्बे की कहानी भी कहती है। बिरला मैदान में इन दिनों 30 वर्षीय नारायण सेठ मां दुर्गा के भव्य दरबार को आकार देने में जुटे हैं। नारायण बांस के ढांचे को तैयार करने से लेकर उसे रस्सियों से मजबूती देने तक का काम पूरी कुशलता के साथ कर रहे हैं। खास बात यह है कि नारायण के पास सिर्फ एक हाथ है। इसके बावजूद जिस आत्मविश्वास, फुर्ती और लगन के साथ वह पूजा पंडाल के निर्माण में जुटे हैं, वह हर किसी को प्रेरित कर रहा है।

12 साल पहले हादसे ने छीना हाथ, हौसला नहीं
नारायण सेठ की जिंदगी करीब 12 साल पहले एक दर्दनाक सड़क हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी। इस हादसे में उन्होंने अपना एक हाथ गंवा दिया। किसी भी इंसान के लिए अचानक शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग खो देना बेहद मुश्किल अनुभव होता है। हादसे के बाद नारायण के सामने भी कई चुनौतियां खड़ी हुईं। जिंदगी सामान्य तरीके से आगे बढ़ाना आसान नहीं था।लेकिन नारायण ने परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय उन्हें चुनौती के रूप में स्वीकार किया। हादसे ने उनका एक हाथ जरूर छीन लिया, लेकिन उनके भीतर मेहनत करने का जज्बा और अपने पैरों पर खड़े होने का संकल्प नहीं छीन सका। समय के साथ नारायण ने खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढाला और अपने काम में लगातार मेहनत करते रहे। आज वह अपने एक हाथ की मदद से ऐसे काम कर रहे हैं, जिन्हें देखकर कई लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

एक हाथ से बांस का जटिल ढांचा तैयार कर रहे नारायण
बिरला मैदान में दुर्गा पूजा पंडाल निर्माण के दौरान नारायण जिस तरह से बांस के ढांचे को तैयार कर रहे हैं, वह उनकी कार्यकुशलता और आत्मविश्वास को दिखाता है। बांस को सही आकार देना, उसे निर्धारित जगह पर लगाना और रस्सियों से मजबूती के साथ बांधना आसान काम नहीं है। इसके लिए शारीरिक मेहनत के साथ-साथ अनुभव और तकनीकी समझ की भी जरूरत होती है। नारायण अपने एक हाथ के सहारे इन सभी कामों को बखूबी अंजाम दे रहे हैं। उनके काम करने का तरीका यह संदेश देता है कि किसी कमी को कमजोरी मान लेना जरूरी नहीं है। अगर इंसान परिस्थितियों से लड़ने का हौसला रखता है, तो वह अपने लिए नई राह बना सकता है।

मां दुर्गा के दरबार को आकार देने में जुटे
दुर्गा पूजा श्रद्धा और आस्था का पर्व है। मां दुर्गा के स्वागत के लिए बनाए जाने वाले पूजा पंडालों में कारीगरों की मेहनत सबसे अहम होती है। महीनों की तैयारी और लगातार मेहनत के बाद पंडाल को अंतिम रूप मिलता है। बिरला मैदान में भी मां दुर्गा के भव्य दरबार को आकार देने का काम चल रहा है। इसी तैयारी में नारायण सेठ की मेहनत भी शामिल है। उनके लिए यह सिर्फ रोजी-रोटी का काम नहीं, बल्कि मां दुर्गा के दरबार को अपने हाथों से आकार देने का अवसर भी है। एक हाथ से काम करते हुए उनका आत्मविश्वास यह बताता है कि आस्था और मेहनत मिल जाए तो मुश्किल से मुश्किल काम भी संभव हो सकता है।

नारायण की कहानी देती है बड़ी सीख
नारायण सेठ की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो जिंदगी में आने वाली मुश्किलों से जल्दी निराश हो जाते हैं। उनके जीवन में एक ऐसा हादसा आया, जिसने उनका शरीर बदल दिया, लेकिन वह उनकी सोच और हिम्मत को नहीं बदल सका।अक्सर छोटी-छोटी परेशानियों के कारण लोग अपने लक्ष्य से पीछे हट जाते हैं। लेकिन नारायण की जिंदगी बताती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर इंसान अपने भीतर विश्वास बनाए रखे तो रास्ता जरूर निकलता है। एक हाथ खोने के बाद भी नारायण ने अपने काम को नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने दूसरे हाथ को ही अपनी ताकत बनाया और मेहनत के दम पर अपनी पहचान कायम रखी। आज वह जिस तरह मां दुर्गा के दरबार को आकार देने में जुटे हैं, वह अपने आप में एक प्रेरणादायक दृश्य है।

हौसले के आगे मुश्किलें छोटी
नारायण सेठ की तस्वीर को देखकर सबसे पहले यही एहसास होता है कि इंसान की असली ताकत उसके शरीर में नहीं, बल्कि उसके हौसले में होती है। करीब 12 साल पहले हुए हादसे के बाद अगर नारायण चाहते तो परिस्थितियों का हवाला देकर अपने कदम रोक सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत में बदला और मेहनत को अपना साथी बनाया। आज वही नारायण एक हाथ से मां दुर्गा के भव्य दरबार को तैयार करने में जुटे हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि जिंदगी में मुश्किलें आ सकती हैं, लेकिन मंजिल तक पहुंचने का रास्ता बंद नहीं होता। रांची के बिरला मैदान में मां दुर्गा के दरबार को आकार देते नारायण सेठ की तस्वीर इसलिए खास है, क्योंकि इसमें सिर्फ एक कारीगर की मेहनत नहीं दिखाई देती, बल्कि संघर्ष के बाद खड़े होने की पूरी कहानी नजर आती है। यह कहानी बताती है कि हादसा शरीर का एक हिस्सा छीन सकता है, लेकिन अगर हौसला जिंदा हो तो सपनों को पूरा करने की ताकत कोई नहीं छीन सकता।

नारायण सेठ आज सिर्फ एक पूजा पंडाल के कारीगर नहीं, बल्कि हिम्मत, मेहनत और आत्मविश्वास की मिसाल बनकर सामने आए हैं। मां दुर्गा के दरबार को आकार देते उनके हाथ भले ही एक हों, लेकिन उनके हौसले की ऊंचाई किसी से कम नहीं है।


