By: Mala Mandal
रांची: झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें अदालत से राहत नहीं मिली है। झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी डिस्चार्ज याचिका और आरोप तय किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने 6 मई 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि मामले में प्रथमदृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद है और इस स्तर पर आरोपी को डिस्चार्ज करना उचित नहीं होगा। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियां प्रथमदृष्टया विचार तक सीमित हैं और मामले का अंतिम फैसला ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

क्या है आलमगीर आलम से जुड़ा मामला?
यह मामला झारखंड के ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े कथित टेंडर और कमीशन नेटवर्क की जांच से संबंधित है। प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच के दौरान कई लोगों से पूछताछ और दस्तावेजों की जांच की। मामले में आलमगीर आलम के तत्कालीन निजी सचिव संजीव कुमार लाल और उनके सहयोगी जहांगीर आलम समेत कई अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। ईडी की अभियोजन शिकायत के अनुसार, सरकारी विभागों में टेंडर आवंटन से जुड़े कथित कमीशन नेटवर्क की जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आईं। जांच एजेंसी ने दावा किया कि अधिकारियों और अन्य लोगों के बयानों तथा जब्त किए गए दस्तावेजों से कथित कमीशन लेन-देन का नेटवर्क सामने आया। झारखंड हाईकोर्ट के फैसले में अभियोजन पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों का विस्तार से उल्लेख किया गया है। ईडी का आरोप है कि आलमगीर आलम तक कथित कमीशन की रकम उनके निजी सचिव संजीव कुमार लाल और अन्य सहयोगियों के माध्यम से पहुंचाई जाती थी। हालांकि ये सभी आरोप हैं और मामले का अंतिम निर्धारण ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर होना है।

डिस्चार्ज याचिका क्यों दाखिल की गई थी?
आलमगीर आलम ने रांची की विशेष पीएमएलए अदालत में डिस्चार्ज याचिका दाखिल की थी। उनका पक्ष था कि उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है। उनकी ओर से यह भी दलील दी गई कि अभियोजन की ओर से प्रस्तुत सामग्री के आधार पर उनके खिलाफ कार्यवाही आगे बढ़ाने का पर्याप्त आधार नहीं बनता। विशेष पीएमएलए अदालत ने 3 दिसंबर 2024 को उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद 7 दिसंबर 2024 को अदालत ने उनके खिलाफ पीएमएलए की धारा 3 के तहत अपराध और धारा 4 के तहत दंड से संबंधित आरोप तय किए थे। इन दोनों आदेशों को आलमगीर आलम ने झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट में दो आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?
झारखंड हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि डिस्चार्ज के चरण में अदालत को यह देखना होता है कि अभियोजन की ओर से प्रस्तुत रिकॉर्ड और दस्तावेजों के आधार पर आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस चरण में अदालत को पूरे मामले का विस्तृत ट्रायल करने या साक्ष्यों की अंतिम विश्वसनीयता तय करने की आवश्यकता नहीं होती। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आरोप तय करने या डिस्चार्ज के स्तर पर अदालत को मिनी ट्रायल नहीं करना चाहिए। यदि रिकॉर्ड में ऐसा आधार मौजूद है जिससे आरोपी के खिलाफ आगे कार्यवाही की जरूरत दिखाई देती है, तो मामले को ट्रायल के लिए आगे बढ़ाया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने मामले की अभियोजन शिकायत, जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों, कथित वित्तीय लेन-देन और जब्त दस्तावेजों सहित अन्य सामग्री पर विचार किया। अदालत ने पाया कि इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि आलमगीर आलम के खिलाफ कार्यवाही चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद नहीं है।

कथित कमीशन नेटवर्क का क्या है मामला?
हाईकोर्ट के आदेश में ईडी की ओर से लगाए गए आरोपों का उल्लेख है। अभियोजन के अनुसार ग्रामीण विकास से जुड़े विभागों में टेंडर के आवंटन के बदले कथित तौर पर कमीशन लिया जाता था। ईडी ने दावा किया कि इस कथित नेटवर्क में अलग-अलग स्तरों पर अधिकारियों और अन्य लोगों की भूमिका थी। जांच एजेंसी ने कुछ बयानों और दस्तावेजों के आधार पर आलमगीर आलम की कथित भूमिका का उल्लेख किया। ईडी के अनुसार, कथित कमीशन की रकम उनके निजी सचिव और अन्य सहयोगियों के माध्यम से संग्रहित किए जाने का आरोप है। अदालत ने इन आरोपों को अंतिम रूप से सत्य घोषित नहीं किया है। हाईकोर्ट के आदेश में स्पष्ट किया गया है कि इस स्तर पर की गई टिप्पणियां प्रथमदृष्टया हैं और ट्रायल कोर्ट मामले की सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला करेगा।

सुप्रीम कोर्ट का नाम क्यों आया?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि डिस्चार्ज याचिका खारिज करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट का नहीं बल्कि झारखंड हाईकोर्ट का है। हाईकोर्ट ने 6 मई 2026 को आलमगीर आलम की दोनों आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज की थीं। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों का हवाला जरूर दिया गया है। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से यह सिद्धांत दोहराया कि आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में प्रारंभिक स्तर पर अदालत को तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जब तक कार्यवाही रोकने का कोई मजबूत कानूनी आधार न हो। इसलिए खबर को प्रकाशित करते समय “सुप्रीम कोर्ट से डिस्चार्ज याचिका खारिज” लिखने के बजाय “झारखंड हाईकोर्ट ने आलमगीर आलम की डिस्चार्ज याचिका खारिज की” लिखना अधिक सटीक होगा।

अब आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद आलमगीर आलम के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले की ट्रायल प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ है। अदालत ने निचली अदालत के 3 दिसंबर 2024 के डिस्चार्ज याचिका खारिज करने और 7 दिसंबर 2024 को आरोप तय करने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, डिस्चार्ज याचिका खारिज होना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि अदालत ने इस स्तर पर मुकदमा समाप्त करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया। अब मामले में साक्ष्यों, गवाहों और दस्तावेजों की न्यायिक जांच ट्रायल के दौरान होगी।

झारखंड हाईकोर्ट ने अपने फैसले के अंतिम हिस्से में साफ किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियों को मामले के गुण-दोष पर अंतिम राय नहीं माना जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट मामले का निर्णय कानून के अनुसार और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर करेगा।
इस तरह आलमगीर आलम से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फिलहाल महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति यह है कि उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज हो चुकी है और मामले की न्यायिक प्रक्रिया आगे जारी रहेगी।


