पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) के चाणक्य कहे जाने वाले गृह मंत्री अमित शाह ने एक ऐसी राजनीतिक चाल चली है, जिसने विपक्ष की नींद उड़ा दी है। पार्टी के अंदर उठ रहे असंतोष को शांत करने और संगठन को मजबूती देने के लिए अमित शाह ने कई बागी नेताओं को दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया है। इस कदम से न केवल बीजेपी की चुनावी तैयारियों को नया जोश मिला है, बल्कि NDA के भीतर तालमेल और सीटों के समीकरण भी मजबूत हुए हैं।
बागियों की घर वापसी: रणनीति के केंद्र में अमित शाह
सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों से बीजेपी नेतृत्व लगातार उन नेताओं से संपर्क में था जिन्होंने टिकट कटने या गुटबाजी के चलते पार्टी छोड़ी थी। अमित शाह ने खुद इस मिशन की कमान संभाली और ‘संतुलित संगठन + चुनावी फोकस’ के फॉर्मूले पर काम किया।
दिल्ली में हुई एक अहम बैठक में उन्होंने उन बागियों को भरोसा दिया कि पार्टी उन्हें सम्मानजनक भूमिका देगी। परिणामस्वरूप, कई पूर्व विधायक और ज़मीनी कार्यकर्ता फिर से बीजेपी में लौट आए हैं।
पार्टी सूत्र बताते हैं कि शाह का मानना है — “बिहार में कोई भी सीट छोटी नहीं होती, हर कार्यकर्ता की भूमिका निर्णायक होती है।” इसीलिए उन्होंने पुराने कार्यकर्ताओं को फिर से जोड़ने की मुहिम शुरू की।
कौन लौटे बीजेपी में?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीवान, भोजपुर, गया और दरभंगा जैसे इलाकों से कई बागी नेता दोबारा बीजेपी में शामिल हुए हैं।
इनमें कुछ नाम स्थानीय स्तर पर बेहद प्रभावशाली हैं, जो NDA के लिए वोट ट्रांसफर में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि पार्टी ने अभी सभी नामों का आधिकारिक ऐलान नहीं किया है, लेकिन माना जा रहा है कि 20 से अधिक बागी नेताओं ने बीजेपी की सदस्यता दोबारा ली है।
विपक्ष में मची हलचल
बीजेपी की इस रणनीतिक चाल से महागठबंधन (RJD, कांग्रेस और वाम दलों) के भीतर हलचल मच गई है।
RJD नेताओं को डर है कि जिन सीटों पर बीजेपी पहले कमजोर मानी जा रही थी, वहां अब बागियों की वापसी से NDA को अप्रत्याशित बढ़त मिल सकती है। कांग्रेस और RJD के बीच सीट बंटवारे को लेकर चल रहे मतभेद भी इस स्थिति में उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अमित शाह की यह रणनीति ‘माइक्रो लेवल स्ट्राइक’ की तरह काम कर रही है — यानी जहां विपक्ष मजबूत है, वहां बीजेपी अब अपने पुराने काडर और स्थानीय चेहरों के सहारे घुसपैठ बना रही है।
नीतीश कुमार और शाह की बैठक से बढ़ा संकेत
गौरतलब है कि हाल ही में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और अमित शाह की मुलाकात दिल्ली में हुई थी।
इस बैठक के बाद से ही संकेत मिल रहे थे कि NDA के अंदर टिकट वितरण और रणनीति को लेकर अंतिम फैसला शाह की सलाह से होगा।
नीतीश कुमार भी जानते हैं कि बिहार में बीजेपी की संगठनात्मक ताकत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब विपक्ष एकजुट नहीं दिख रहा।
चुनावी समीकरण: NDA को फायदा, विपक्ष पर दबाव
राजनीतिक पंडितों के मुताबिक, बागियों की वापसी से NDA को करीब 25-30 सीटों पर सीधा फायदा मिल सकता है।
जहां पहले वोटों का बंटवारा होता, अब वे सीटें बीजेपी के लिए “सुरक्षित ज़ोन” बन सकती हैं।
दूसरी ओर, विपक्षी गठबंधन की अंदरूनी खींचतान से उनके मतदाता भी असमंजस में हैं।
पटना यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. आर.एन. झा कहते हैं —
“अमित शाह की ताकत यही है कि वे रणनीति को ज़मीन से जोड़ते हैं। बिहार में उनका यह कदम बीजेपी को संगठनात्मक ऊर्जा और मनोवैज्ञानिक बढ़त दोनों देगा।”
सोशल इंजीनियरिंग पर फोकस
अमित शाह ने इस बार जातीय समीकरणों को भी नए सिरे से साधने की कोशिश की है।
बीजेपी नेतृत्व ने अति पिछड़ा वर्ग (EBC), दलित और युवा वोट बैंक पर विशेष ध्यान दिया है।
पार्टी का फोकस यह है कि हर वर्ग को NDA के विकास एजेंडे से जोड़ा जाए, ताकि विपक्ष की जातीय राजनीति कमजोर पड़े।
डिजिटल कैंपेन और बूथ प्रबंधन की तैयारी
अमित शाह ने बिहार के सभी जिलाध्यक्षों को साफ निर्देश दिया है कि डिजिटल प्रचार और बूथ प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए।
हर विधानसभा क्षेत्र में 10 से 15 ‘माइक्रो बूथ कोऑर्डिनेटर’ नियुक्त किए जा रहे हैं जो मतदाताओं से सीधे संपर्क करेंगे।
बीजेपी का लक्ष्य है — “हर वोट, हर घर तक पहुँच।”
अमित शाह की मास्टर स्ट्रोक से NDA को नई ऊर्जा
कुल मिलाकर, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले अमित शाह की यह चाल बीजेपी के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है।
बागियों की वापसी ने न केवल संगठन की एकता को मजबूत किया है, बल्कि पार्टी की ज़मीनी पकड़ भी बढ़ाई है।
जहां विपक्ष अब भी टिकट बंटवारे और नेतृत्व संकट में उलझा है, वहीं अमित शाह ने चुनावी शतरंज की बिसात पर ऐसी चाल चली है, जिससे NDA के पलड़े भारी होते दिख रहे हैं।
