By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली। हिलसा मछली यानी इलिश इन दिनों भारत और बांग्लादेश के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। वजह है बांग्लादेश का 23 सितंबर 2026 से भारत से हिलसा मछली के आयात पर अचानक रोक लगा देना। बांग्लादेश के मत्स्य विभाग ने भारतीय हिलसा के आयात के लिए जारी किए गए 103 नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट यानी एनओसी रद्द कर दिए। इसके साथ ही बेनापोल लैंड पोर्ट के रास्ते भारत से हिलसा की आवक रोक दी गई।

इस पूरे मामले ने इसलिए ज्यादा तूल पकड़ा है क्योंकि पिछले करीब दो महीनों में भारत से बड़ी मात्रा में हिलसा बांग्लादेश पहुंची थी। बांग्लादेश के बेनापोल बंदरगाह के आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई से 20 सितंबर के बीच भारत से करीब 553 टन हिलसा आयात की गई, जिसकी घोषित कीमत लगभग 9.10 लाख अमेरिकी डॉलर बताई गई है। कुछ अन्य रिपोर्टों में करीब 535 से 580 टन तक भारतीय हिलसा के बांग्लादेश पहुंचने का उल्लेख है।
गुजरात के नर्मदा और भरूच से पहुंची हिलसा
इस बार हिलसा के व्यापार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। आमतौर पर बांग्लादेश की पद्मा, मेघना और अन्य नदी प्रणालियों की हिलसा को लेकर वहां विशेष मांग रहती है। लेकिन इस बार भारत के गुजरात से बड़ी मात्रा में हिलसा बांग्लादेश पहुंची। रिपोर्टों के अनुसार गुजरात के भरूच और नर्मदा क्षेत्र से आई हिलसा का हिस्सा बांग्लादेशी बाजारों में पहुंचा। यह व्यापार इसलिए भी खास था क्योंकि पारंपरिक रूप से हिलसा का व्यापार भारत से बांग्लादेश की दिशा में इतना बड़ा नहीं रहा है।

बांग्लादेश में आरोप सामने आए कि कुछ कारोबारियों ने भारतीय हिलसा को स्थानीय या पद्मा हिलसा बताकर ग्राहकों को बेचा। खरीदारों के एक वर्ग ने मछली के स्वाद और बनावट में अंतर महसूस करने की शिकायत की। बांग्लादेशी मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार कुछ ग्राहकों ने कहा कि पकाने के बाद मछली का स्वाद और बनावट उस हिलसा जैसी नहीं थी, जिसे वे पद्मा की हिलसा के रूप में जानते हैं। हालांकि, यहां यह साफ करना जरूरी है कि बांग्लादेश सरकार ने आयात रोकने की आधिकारिक वजह के रूप में इस कथित मिलावट या गलत लेबलिंग की पुष्टि नहीं की है। मत्स्य विभाग ने 103 एनओसी रद्द कर आयात रोक दिया, लेकिन इसके पीछे विस्तृत कारण सार्वजनिक तौर पर नहीं बताया गया। कारोबार से जुड़े लोगों ने इसके कई संभावित कारण बताए हैं, जिनमें भारतीय हिलसा को स्थानीय हिलसा के नाम पर बेचना, आयात में कम कीमत दिखाने की आशंका और घरेलू हिलसा उत्पादन को बढ़ावा देना शामिल हैं।

बंगालियों के लिए सिर्फ मछली नहीं है हिलसा
हिलसा का बंगाल और बांग्लादेश की संस्कृति से बेहद पुराना रिश्ता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसे सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि खान-पान और संस्कृति का हिस्सा माना जाता है। बारिश के मौसम में हिलसा की मांग बढ़ जाती है। सरसों के तेल और मसालों में पकाई गई हिलसा बंगाली भोजन की पहचान मानी जाती है। बंटवारे के बाद भारत और बांग्लादेश राजनीतिक रूप से अलग हुए, लेकिन हिलसा का स्वाद दोनों तरफ की रसोई में अपनी जगह बनाए रहा। कोलकाता से लेकर ढाका और चटगांव तक हिलसा को लेकर अलग-अलग पसंद और धारणाएं हैं। पद्मा नदी की हिलसा को बांग्लादेश में विशेष प्रतिष्ठा हासिल है, जबकि पश्चिम बंगाल में गंगा-हुगली क्षेत्र की हिलसा भी बेहद लोकप्रिय है।

यही वजह है कि हिलसा की पहचान सिर्फ उसके आकार या रंग से नहीं होती। उसके स्वाद, तेल की मात्रा, बनावट और पकने के बाद आने वाली खुशबू को लेकर भी पारखी ग्राहक काफी सजग रहते हैं। इसी कारण बांग्लादेशी बाजारों में गुजरात से आई हिलसा को पद्मा हिलसा बताकर बेचने के आरोपों ने लोगों का ध्यान खींचा।
कीमत में भी था बड़ा अंतर
बांग्लादेशी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय हिलसा की कीमत स्थानीय पद्मा हिलसा की तुलना में कम बताई गई। एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत से आने वाली हिलसा करीब 500 टका प्रति किलोग्राम के आसपास आयात की गई, जबकि स्थानीय बाजार में इसे पद्मा हिलसा बताकर 2,000 से 3,000 टका प्रति किलोग्राम तक बेचने की शिकायतें सामने आईं। हालांकि ये बाजार और व्यापारियों से जुड़ी रिपोर्टेड कीमतें हैं और हर खेप या बाजार पर लागू नहीं मानी जानी चाहिए। कुछ खरीदारों ने यह भी दावा किया कि गुजरात की हिलसा आकार में बड़ी और अंडे यानी रो से भरपूर थी, लेकिन स्वाद में उन्हें स्थानीय पद्मा हिलसा जैसा अनुभव नहीं हुआ। यही शिकायत सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में चर्चा का कारण बनी।

भारत-बांग्लादेश हिलसा व्यापार की बदली दिशा
इस घटनाक्रम की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस बार हिलसा का व्यापार सामान्य दिशा से उलट गया। वर्षों से दुर्गापूजा के आसपास बांग्लादेश से सीमित मात्रा में हिलसा भारत भेजे जाने की परंपरा रही है। लेकिन 2026 में पहली बार बड़े पैमाने पर भारत से हिलसा बांग्लादेश पहुंची। रिपोर्टों के मुताबिक पिछले दो महीनों में 500 टन से ज्यादा हिलसा भारत से बांग्लादेश गई। बांग्लादेश ने 2012 में हिलसा के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था, हालांकि बाद के वर्षों में दुर्गापूजा के दौरान सीमित अवधि के लिए भारत को हिलसा भेजने की अनुमति दी जाती रही। इस साल भारत से बांग्लादेश की ओर हिलसा जाने के बाद अब भारत में भी इस बात को लेकर उत्सुकता है कि क्या बांग्लादेश दुर्गापूजा के दौरान भारत के लिए हिलसा निर्यात की अनुमति देगा।

कारोबारियों को भी झटका
अचानक आयात रोक दिए जाने से बांग्लादेश के कई आयातकों को आर्थिक नुकसान की चिंता सताने लगी है। कुछ व्यापारियों ने बताया कि उन्होंने पहले ही भारत से मछली खरीद ली थी और उसे बांग्लादेश भेजने की तैयारी थी। एनओसी रद्द होने के बाद ऐसी खेपों को लेकर कारोबारियों के सामने नुकसान का खतरा पैदा हो गया। बेनापोल के रास्ते हिलसा आयात रोकने का असर सिर्फ मछली कारोबार तक सीमित नहीं है। यह मामला भारत-बांग्लादेश के बीच बदलते खाद्य व्यापार और दोनों देशों में हिलसा की मांग से भी जुड़ा हुआ है।

हिलसा की पहचान पर क्यों मचा विवाद?
असल सवाल यही है कि क्या गुजरात की हिलसा और पद्मा की हिलसा के स्वाद में इतना अंतर होता है कि पारखी ग्राहक इसे पहचान सकें? इस पर विशेषज्ञों और मछली कारोबारियों की राय अलग-अलग हो सकती है। हिलसा का स्वाद उसके नदी क्षेत्र, पानी की परिस्थितियों, भोजन, आकार, वसा और पकाने के तरीके जैसे कई कारकों से प्रभावित हो सकता है।

इसलिए किसी मछली को सिर्फ स्वाद के आधार पर निश्चित रूप से किसी खास नदी या क्षेत्र की बताना आसान नहीं है। मौजूदा विवाद में भी यही महत्वपूर्ण है कि भारतीय हिलसा को पद्मा हिलसा बताकर बेचने के आरोप सामने आए हैं, लेकिन बांग्लादेश सरकार ने इन्हें आयात रोकने की आधिकारिक वजह के रूप में घोषित नहीं किया है।
फिलहाल इतना तय है कि हिलसा ने एक बार फिर भारत और बांग्लादेश के बीच अपनी खास जगह की याद दिला दी है। यह मछली सिर्फ बाजार का कारोबार नहीं, बल्कि दोनों देशों के करोड़ों लोगों के स्वाद, परंपरा और भावनाओं से जुड़ी हुई है। गुजरात से बांग्लादेश पहुंची हिलसा ने जहां व्यापार की दिशा बदली, वहीं उसके स्वाद को लेकर उठे सवालों ने पद्मा हिलसा की पहचान और प्रतिष्ठा पर नई बहस छेड़ दी है।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बांग्लादेश भारतीय हिलसा के आयात पर लगी रोक को जारी रखता है या इसमें कोई बदलाव करता है। साथ ही दुर्गापूजा के दौरान भारत को बांग्लादेशी हिलसा की संभावित आपूर्ति पर भी लोगों और कारोबारियों की नजर रहेगी।
