पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महागठबंधन (महागठबंधन) के भीतर सीटों को लेकर खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही है। कांग्रेस के एक उम्मीदवार द्वारा नामांकन वापस लेने के बावजूद अब भी 10 सीटों पर फ्रेंडली फाइट जारी रहने जा रही है। इन सीटों पर राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस (INC) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में हैं।
महागठबंधन के भीतर तालमेल की चुनौती
महागठबंधन में शामिल दलों के बीच सीट बंटवारे पर सहमति बनने के बाद भी कई स्थानों पर स्थानीय स्तर पर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। खासकर कांग्रेस और राजद कार्यकर्ताओं के बीच कई विधानसभा क्षेत्रों में असहमति बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार, जिन 10 सीटों पर फ्रेंडली फाइट हो रही है, वहां उम्मीदवारों ने या तो नामांकन वापस नहीं लिया या फिर समय रहते पार्टी नेतृत्व से स्पष्ट निर्देश नहीं मिल सके। इस कारण अब मतदाता भ्रम की स्थिति में हैं कि गठबंधन का “आधिकारिक” उम्मीदवार कौन है।
राजद-कांग्रेस में आपसी तालमेल की कमी
गठबंधन के मुख्य दल राजद और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर मतभेद लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि राजद ने कई सीटों पर पहले से अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी, जबकि बातचीत जारी थी। वहीं, राजद नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को दिए गए हिस्से में भी कई ऐसी सीटें थीं, जहां पार्टी की पकड़ कमजोर थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन विवादों का सीधा असर महागठबंधन की सीटों पर पड़ेगा। फ्रेंडली फाइट का फायदा सीधे तौर पर विपक्षी दल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को हो सकता है।
कांग्रेस के नामांकन वापसी का असर
हाल ही में कांग्रेस के एक उम्मीदवार ने नामांकन वापस लिया, जिससे उम्मीद जताई जा रही थी कि फ्रेंडली फाइट खत्म हो जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पार्टी सूत्रों के अनुसार, “स्थानीय दबाव और व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं” के कारण कई उम्मीदवार अब भी मैदान में डटे हुए हैं। इन सीटों पर पार्टी स्तर पर “आधिकारिक समर्थन” के बावजूद कई नेता और कार्यकर्ता अपने-अपने उम्मीदवारों के साथ डटे हैं। इससे यह साफ झलकता है कि जमीनी स्तर पर गठबंधन का तालमेल उतना मजबूत नहीं है, जितना कि दिखाने की कोशिश की जा रही है।
महागठबंधन की रणनीति पर उठ रहे सवाल
राजद-कांग्रेस-सीपीआई की यह अंदरूनी खींचतान बिहार की चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े कर रही है। महागठबंधन की ओर से दावा किया जा रहा है कि सभी दल एकजुट हैं और भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए “साझा एजेंडा” पर काम कर रहे हैं। हालांकि, ग्राउंड रिपोर्ट्स के अनुसार, कई जगहों पर कार्यकर्ता आपस में प्रतिस्पर्धा करते नजर आ रहे हैं। इससे न सिर्फ मतदाताओं में भ्रम की स्थिति बन रही है, बल्कि चुनावी संदेश भी कमजोर पड़ रहा है।
10 सीटों पर दिलचस्प मुकाबला
जानकारी के अनुसार, पटना, दरभंगा, गया, सहरसा, अररिया और भागलपुर जैसे जिलों की 10 विधानसभा सीटों पर फ्रेंडली फाइट सबसे ज्यादा देखने को मिलेगी।
इन सीटों पर जहां राजद ने अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, वहीं कांग्रेस और सीपीआई के प्रत्याशी भी नामांकन वापस लेने को तैयार नहीं हुए। इन सीटों पर अब वोटों का बंटवारा तय माना जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, “इन सीटों पर मुकाबला बेहद दिलचस्प रहेगा क्योंकि तीनों दलों के समर्थक समान सामाजिक आधार से आते हैं। ऐसे में वोट बैंक का बंटवारा निश्चित रूप से विपक्ष के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।”
एनडीए के लिए अवसर
फ्रेंडली फाइट की यह स्थिति एनडीए गठबंधन के लिए राहत की खबर के रूप में देखी जा रही है। भाजपा और जदयू नेताओं का कहना है कि “महागठबंधन अंदरूनी मतभेदों में उलझा हुआ है, जबकि एनडीए एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरा है।”
एनडीए की रणनीति अब इन सीटों पर फोकस करने की है, जहां महागठबंधन में दो या तीन उम्मीदवार आमने-सामने हैं। इससे भाजपा और जदयू को सीधे तौर पर फायदा मिलने की संभावना जताई जा रही है।
राजनीतिक भविष्य पर असर
बिहार चुनाव 2025 में महागठबंधन की यह अंदरूनी लड़ाई आगामी राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकती है। अगर इन सीटों पर हार का कारण वोटों का बंटवारा रहा, तो चुनाव बाद कांग्रेस और राजद के रिश्तों में और खटास आने की संभावना है।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि “महागठबंधन को अपनी रणनीति पर तुरंत पुनर्विचार करना चाहिए, नहीं तो यह फ्रेंडली फाइट पूरे चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है।”

