By: Mala Mandal
देवघर/मोहनपुर। देवघर जिले के मोहनपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत बाराकोला मौजा में जमीन विवाद का मामला अब अनुमंडल दंडाधिकारी (एसडीओ) के न्यायालय तक पहुंच गया है। मामले में एक आदिवासी परिवार ने अपनी जमीन पर दूसरे पक्ष द्वारा कथित तौर पर कब्जा करने और बिना अधिकार के काम किए जाने का आरोप लगाते हुए प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है। शिकायतकर्ता विनोद मोहली, पिता धुरपति मोहली, ग्राम बाराकोला, थाना मोहनपुर, जिला देवघर के निवासी बताए गए हैं। शिकायत में जमीन पर जबरन काम किए जाने का आरोप लगाया गया है।

मामला मोहनपुर थाना क्षेत्र के बाराकोला मौजा स्थित जमीन से जुड़ा है। उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार विवादित जमीन का विवरण मौजा बाराकोला, थाना मोहनपुर, खाता नंबर 721, प्लॉट नंबर 500, जमाबंदी नंबर 24 तथा करीब 6.23 एकड़ रकबा के रूप में दर्ज है। जमीन को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न होने के बाद मामला प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया में पहुंच गया है।
आदिवासी परिवार ने लगाया जमीन पर कब्जे का आरोप
शिकायतकर्ता की ओर से दिए गए आवेदन में आरोप लगाया गया है कि संबंधित जमीन पर दूसरे पक्ष द्वारा कथित रूप से काम कराया जा रहा था। शिकायतकर्ता के अनुसार, जब उसने इसका विरोध किया तो विवाद की स्थिति उत्पन्न हुई। आवेदन में पुलिस को सूचना देने और मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित करने का भी उल्लेख है। शिकायतकर्ता ने प्रशासन से पूरे मामले की जांच कर अपनी जमीन और अधिकार की सुरक्षा की मांग की है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विवादित जमीन पर दावा करने वाला परिवार खुद को आदिवासी परिवार से जुड़ा बता रहा है। झारखंड में आदिवासी समुदाय के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि आजीविका, सामाजिक पहचान और पीढ़ियों से जुड़े अधिकार का आधार मानी जाती है। ऐसे में जमीन को लेकर विवाद सामने आने पर परिवार के लिए यह महज एक कानूनी मामला नहीं रह जाता, बल्कि उसके भविष्य और सुरक्षा से जुड़ा सवाल भी बन जाता है।
भू-माफियाओं पर सवाल, लेकिन जांच के बाद ही साफ होगी तस्वीर
स्थानीय स्तर पर जमीन विवादों में अक्सर भू-माफिया और जमीन पर अवैध कब्जे जैसे आरोप सामने आते रहे हैं। इस मामले में भी शिकायतकर्ता की ओर से दूसरे पक्ष पर जमीन पर कब्जे की कोशिश का आरोप लगाया गया है। हालांकि, संबंधित लोगों को कानूनी रूप से भू-माफिया घोषित करने या जमीन पर अवैध कब्जे की पुष्टि करने से पहले प्रशासनिक जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। यही वजह है कि इस पूरे मामले में अब प्रशासन के सामने सबसे अहम जिम्मेदारी यह है कि जमीन के वास्तविक दस्तावेज, जमाबंदी, कब्जे की स्थिति और दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष तरीके से जांच की जाए। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है और यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो वास्तविक स्थिति भी सामने आ सकेगी।

एसडीओ कोर्ट ने शुरू की कार्रवाई
जमीन विवाद को लेकर मामला अनुमंडल दंडाधिकारी का न्यायालय, देवघर पहुंचा है। दस्तावेज में इसे क्रिमिनल मिस केस नंबर 119/2026 के रूप में दर्ज किया गया है। मामले में प्रथम पक्ष के रूप में विनोद मोहली का नाम दर्ज है, जबकि दूसरे पक्ष में पांच लोगों के नाम अंकित हैं। न्यायालय के आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 164, जिसे पुराने कानून में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के रूप में जाना जाता था, के तहत कार्रवाई शुरू किए जाने का उल्लेख है। आदेश में कहा गया है कि विवादित जमीन के दखल-कब्जे को लेकर दोनों पक्षों के बीच वास्तविक विवाद के कारण शांति भंग होने की संभावना है। इसी को देखते हुए दोनों पक्षों के विरुद्ध कार्रवाई शुरू की गई है।

दोनों पक्षों को शांति बनाए रखने का निर्देश
एसडीओ न्यायालय की ओर से दोनों पक्षों को किसी भी प्रकार का शांति भंग नहीं करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही दोनों पक्षों को निर्धारित तिथि को न्यायालय में उपस्थित होकर विवादित जमीन के दखल-कब्जे से संबंधित अपना-अपना लिखित बयान, साक्ष्य और संबंधित भूमि के मूल दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया है। न्यायालय के आदेश में विवादित जमीन का विवरण भी स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है। इसके अनुसार मोहनपुर थाना अंतर्गत बाराकोला मौजा की खाता संख्या 721, प्लॉट संख्या 500, जमाबंदी संख्या 24 और करीब 6.23 एकड़ जमीन विवाद का विषय है। आदेश की एक प्रति संबंधित जमीन पर चस्पा कर तामिला कराने का निर्देश भी दिया गया है।

जमीन बचाने की लड़ाई में प्रशासन से उम्मीद
एक तरफ आदिवासी परिवार अपनी जमीन पर अधिकार और सुरक्षा की मांग कर रहा है, तो दूसरी तरफ मामला अब न्यायालय की प्रक्रिया में पहुंच चुका है। ऐसे में परिवार की नजर अब प्रशासनिक जांच और न्यायालय के अगले आदेश पर टिकी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर विवादित जमीन का वास्तविक कब्जेदार कौन है और जमीन पर किसका कानूनी अधिकार है? क्या वास्तव में किसी पक्ष द्वारा जमीन पर जबरन कब्जे की कोशिश की गई या फिर यह आपसी भूमि विवाद का मामला है? इन सभी सवालों का जवाब अब दस्तावेजों, साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही स्पष्ट होगा।

फिलहाल एसडीओ न्यायालय ने दोनों पक्षों को शांति बनाए रखने का निर्देश देते हुए संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने वाले साक्ष्य इस पूरे विवाद की दिशा तय करेंगे।

एक आदिवासी परिवार के लिए उसकी जमीन सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं होती। उसमें उसकी मेहनत, उसका घर, उसकी आजीविका और आने वाली पीढ़ियों की उम्मीद जुड़ी होती है। इसलिए जरूरत है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि किसी पक्ष के अधिकार का उल्लंघन हुआ है तो कानून के अनुसार उसे न्याय मिले।


