By: Vikash Kumar (Vicky)
सुप्रीम कोर्ट ने 21 जनवरी 2026 को अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन के मामले पर गंभीर चिंता जताई है और कहा कि लगातार जारी अवैध खनन से ऐसे हालात उत्पन्न होंगे, जिन्हें समय रहते नहीं सुधारा जा सकेगा। कोर्ट ने अवैध खनन को रोकने, पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करने और वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लेने के लिए एक विशेषज्ञ (एक्सपर्ट) कमेटी गठित करने के निर्देश दिए हैं।

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अरावली हिल्स से जुड़ी पुराने आदेशों पर सुनवाई करते हुए एक बार फिर से अवैध खनन को लेकर गंभीर टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि अरावली पर्वतीय क्षेत्र में जारी अवैध खनन कार्य न केवल वर्तमान में नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि भविष्य में निराकरणीय पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकता है, जिसे सुधार पाना मुश्किल होगा। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि अवैध खनन गतिविधियाँ तत्काल रोकी जाएँ और इसके लिए उच्च स्तरीय विशेषज्ञ कमेटी बनाई जायेगी।
कोर्ट के समक्ष पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं और सरकार के प्रतिनिधियों ने बताया कि पहले से जारी रोक के बावजूद कई इलाकों में खनन गतिविधियाँ छुपे रूप में जारी हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि अगर इसी तरह अनियंत्रित खनन चलता रहा तो अरावली की पारिस्थितिकी संरचना अपूरणीय रूप से प्रभावित हो सकती है, जिसके प्रभाव दशकों तक रहेंगे।
विशेषज्ञ कमेटी का गठन:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खनन और पर्यावरणीय प्रभावों का वैज्ञानिक मूल्यांकन कराने के लिए एक विशेषज्ञ कमेटी बनायी जाएगी। इस कमेटी में पर्यावरण, भूविज्ञान, वन विज्ञान और खनन विशेषज्ञ शामिल होंगे, जो विस्तृत अध्ययन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे। कोर्ट ने दोनों पक्षों से सुझाव मांगे कि वे उपयुक्त विशेषज्ञों के नाम सुझाएँ ताकि यह कमेटी जल्द गठित की जा सके।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कमेटी सीधे सुप्रीम कोर्ट के नियंत्रण और पर्यवेक्षण में काम करेगी और इसके निष्कर्ष अदालत के समक्ष पेश किए जाएंगे। इसका उद्देश्य खनन पर नियंत्रण के वैज्ञानिक और ठोस उपाय सुझाना है, ताकि अरावली की पारिस्थितिकीय स्थिरता को लंबे समय तक संरक्षित किया जा सके।
अवैध खनन रोकने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों — विशेषकर राजस्थान सरकार को — स्पष्ट निर्देश दिए कि वे अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार के अवैध खनन गतिविधि को बिल्कुल नहीं होने दें। अदालत ने कहा कि कानून अपने तरीके से उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करेगा जो नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहे हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अरावली पर्वतमाला भारत के पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल जैव विविधता का घर है बल्कि अनेक राज्यों के जल स्रोत, वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। वरिष्ठ वकीलों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने बताया कि अरावली का विनाश, यदि जारी रहा, तो इससे स्थानीय और आसपास के क्षेत्रों—विशेषकर दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान—पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
नया आदेश और पुराने विवाद का संदर्भ:
यह आदेश पिछले साल 20 नवंबर को दिये गए सुप्रीम कोर्ट के एक विवादित फैसले के सिलसिले में आया है, जिसमें अदालत ने अरावली हिल्स की परिभाषा को वैज्ञानिक रूप से निर्धारित करने के लिए कुछ मानदंड तय किये थे। इस पर विवाद उठे कि इससे संरक्षण क्षेत्र सीमित हो जाएगा और खनन को बढ़ावा मिलेगा। कोर्ट ने तब अपने निर्णय को कुछ विवादित मानदंडों के कारण स्थगित कर रखा था और अब इसी मुद्दे पर विस्तृत समीक्षा की जरूरत बताई जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अवैध खनन गतिविधियाँ न केवल कानून का उल्लंघन हैं बल्कि प्राकृतिक ढांचे को नुकसान पहुँचाने वाली गंभीर अव्यवसायिक गतिविधियाँ हैं, जिनका प्रभाव ग्लोबल वर्मींग, जल संकट और भूमि क्षरण जैसे पर्यावरणीय संकटों को और बढ़ा सकता है। अदालत के अनुसार यदि समय रहते और प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो अरावली की पारिस्थितिकीय संरचना का पुनर्निर्माण लगभग असम्भव हो जाएगा।
राज्य सरकारों का पक्ष और आश्वासन:
राजस्थान सरकार के अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल के माध्यम से कोर्ट को आश्वासन दिया गया कि राज्य सभी आवश्यक कदम उठायेगा ताकि कोई भी अवैध खनन गतिविधि नहीं चले और पर्यावरण संरक्षण के आदेशों का अनुपालन पक्का किया जाये। अदालत ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया और कहा कि राज्य सरकारों को भी पारदर्शी कार्ययोजना बनानी और लागू करनी चाहिए, ताकि कानून का पूर्ण पालन हो सके।
अरावली पर्वतमाला का यह मामला पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की चुनौती को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख पर्यावरणीय संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाली न्यायिक सोच को उजागर करता है। विशेषज्ञ कमेटी के गठन से उम्मीद है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समाधान निकलेंगे और खनन के दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी

