दुमका | पर्यावरण संवाददाता
संताल परगना प्रमंडल के पहाड़ी और वनाच्छादित इलाकों से एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्यावरणीय खोज सामने आई है। दुमका जिले के युवा शोधकर्ता कुलेश भंडारी ने यहां पहली बार फ्लाइंग फॉक्स (बड़े चमगादड़) की एक सक्रिय और विशाल कॉलोनी का वैज्ञानिक रूप से दस्तावेज़ीकरण किया है। यह खोज न केवल संताल परगना बल्कि पूरे झारखंड की जैव-विविधता के अध्ययन के लिए एक नई दिशा खोलती है।

यह कॉलोनी दुमका–गोड्डा–पाकुड़ क्षेत्र से जुड़े पहाड़ी जंगलों में पाई गई है, जहां अब तक इस प्रजाति के इतने बड़े समूह का कोई वैज्ञानिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। शोध के दौरान शाम के समय दर्जनों चमगादड़ों को एक साथ ऊंचे पेड़ों से उड़ान भरते देखा गया, जिसे वन्यजीव विज्ञान की भाषा में “मास फ्लाई–आउट” कहा जाता है।
जैव-विविधता के लिहाज से ऐतिहासिक खोज
फ्लाइंग फॉक्स को भारत के सबसे बड़े चमगादड़ों में गिना जाता है। इनकी उपस्थिति किसी भी क्षेत्र के स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र का संकेत मानी जाती है। संताल परगना जैसे आदिवासी और पहाड़ी क्षेत्र में इनका पाया जाना इस बात की पुष्टि करता है कि यहां के जंगल अब भी प्राकृतिक रूप से जीवंत और संतुलित हैं।

कुलेश भंडारी बताते हैं,
> “इतने बड़े समूह को एक साथ उड़ते देखना इस इलाके के लिए असामान्य है। यह हमारे पहाड़ी जंगलों के अब भी स्वस्थ और जीवंत होने का संकेत देता है।”
क्यों खास हैं फ्लाइंग फॉक्स?
फ्लाइंग फॉक्स केवल चमगादड़ नहीं बल्कि जंगल के प्राकृतिक संरक्षक माने जाते हैं। ये फलभक्षी होते हैं और बीज फैलाव व परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार:
ये जंगलों के पुनर्जनन में मदद करते हैं
दुर्लभ पौधों की प्रजातियों को संरक्षित करते हैं
पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं
प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला का अहम हिस्सा हैं
यही कारण है कि इनकी मौजूदगी किसी भी क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत मानी जाती है।

फोटोग्राफी से वैज्ञानिक दस्तावेज़ तक
कुलेश भंडारी द्वारा खींची गई तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि कैसे शाम ढलते ही दर्जनों चमगादड़ एक साथ उड़ान भरते हैं और जंगल के ऊपर मंडराते हुए दूर-दूर तक फैल जाते हैं।
यह दस्तावेज़ीकरण केवल फोटोग्राफी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे आगे संरक्षण अध्ययन (Conservation Study) और शोध-पत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।
यह कार्य अमेरिका स्थित अंतरराष्ट्रीय संस्था The Pollination Project के सहयोग से चल रहे उनके पर्यावरणीय परियोजनाओं का हिस्सा भी है।

वैश्विक मंच तक पहुंच सकती है संताल की खोज
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस अध्ययन को वैज्ञानिक रूप से प्रकाशित किया जाता है तो यह खोज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संताल परगना के जंगलों की पहचान बना सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि झारखंड जैसे राज्य, जहां खनन और वनों की कटाई तेजी से बढ़ी है, वहां इस तरह की खोजें संरक्षण की दिशा में एक मजबूत तर्क प्रस्तुत करती हैं।
स्थानीय लोगों की भी पुष्टि
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पहले भी इस इलाके में चमगादड़ देखे थे, लेकिन इतनी बड़ी और सक्रिय कॉलोनी पहली बार देखी गई है।
एक ग्रामीण ने बताया,
“हम लोग इन्हें उड़ते हुए देखते थे, लेकिन कभी इतनी संख्या में नहीं। अब पता चला कि यह खास प्रजाति है।”

संरक्षण की दिशा में नया रास्ता
इस खोज के बाद अब यह जरूरी हो गया है कि इस क्षेत्र को संरक्षण क्षेत्र (Conservation Zone) के रूप में चिह्नित किया जाए।
वन विभाग और पर्यावरण संस्थाओं से अपेक्षा की जा रही है कि वे इस पर गंभीरता से ध्यान दें, ताकि इस दुर्लभ प्रजाति और इसके आवास को सुरक्षित रखा जा सके।
संताल परगना के जंगलों का बढ़ता महत्व
यह खोज एक बार फिर साबित करती है कि संताल परगना केवल खनिज संसाधनों के लिए नहीं, बल्कि जैव-विविधता के खजाने के रूप में भी जाना जाना चाहिए।
यदि समय रहते संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां ऐसी प्राकृतिक धरोहर से वंचित हो सकती हैं।
निष्कर्ष
दुमका के युवा शोधकर्ता कुलेश भंडारी का यह प्रयास न सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि है बल्कि पूरे झारखंड और संताल परगना के लिए गर्व की बात है।
यह खोज हमें याद दिलाती है कि हमारे आसपास के जंगल केवल हरियाली नहीं, बल्कि जीवन के अनगिनत रूपों का घर हैं, जिन्हें समझना और बचाना हमारी जिम्मेदारी है।
