By: Mala Mandal
देवघर जिले में अल्ट्रा मेगा पावर प्लांट के विरोध से जुड़े बहुचर्चित मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 29 आरोपियों को रिहा कर दिया है। यह फैसला एडीजे तृतीय सह स्पेशल जज राजेंद्र कुमार सिन्हा की अदालत द्वारा सुनाया गया, जिसमें सत्र वाद संख्या 395/2024 पर लंबी सुनवाई के बाद सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।

यह मामला वर्ष 2015 का है, जब देवघर के देवीपुर थाना क्षेत्र के हुसैनाबाद इलाके में प्रस्तावित अल्ट्रा मेगा पावर प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था। उस समय प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस टीम के पहुंचने पर स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी और मामला हिंसक झड़प में बदल गया था।
क्या था पूरा मामला?
घटना 22 जून 2015 की है, जब तत्कालीन सीओ अजय कुमार तिर्की के नेतृत्व में प्रशासनिक टीम जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया के तहत हुसैनाबाद पहुंची थी। इस दौरान स्थानीय ग्रामीणों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। विरोध इतना उग्र हो गया कि आरोप है कि ग्रामीणों ने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर हमला कर दिया, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।
स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा और आत्मरक्षा में फायरिंग भी की गई थी। इस घटना के बाद देवीपुर थाना में कांड संख्या 73/2015 के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस ने सरकारी कार्य में बाधा डालने, मारपीट, हमला करने और अन्य गंभीर धाराओं के तहत कई लोगों को आरोपी बनाया था।

किन-किन लोगों पर था आरोप?
मामले में कुल 29 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया था। ये सभी आरोपी अलग-अलग गांवों जैसे बनगोड़ा, रिखवाद, डोढ़सा, हुसैनाबाद, शाहपुरा, चितरपुर, राजतोड़, अमजोड़ी, झुंडी, फूलकुरी आदि क्षेत्रों के रहने वाले थे। पुलिस की जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल किया गया और मामला अदालत में विचाराधीन रहा।
अदालत में क्या हुआ?
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कुल नौ गवाह पेश किए गए। हालांकि, गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खा रहे थे। कई गवाहों ने अलग-अलग तरह की बातें अदालत के सामने रखीं, जिससे घटना की सटीक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई।
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने इस आधार पर दलील दी कि आरोपियों के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य नहीं हैं। उन्होंने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वहीं, अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया।

अदालत का फैसला
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा करने के बाद अदालत ने पाया कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और ठोस सबूत मौजूद नहीं हैं। इस आधार पर अदालत ने सभी 29 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए स्पष्ट और ठोस प्रमाण आवश्यक होते हैं, जो इस मामले में प्रस्तुत नहीं किए जा सके।

फैसले का असर
इस फैसले के बाद सभी आरोपियों और उनके परिवारों में राहत का माहौल है। करीब नौ साल से चल रहे इस मामले में अदालत के फैसले ने उन्हें बड़ी राहत दी है। वहीं, यह मामला एक बार फिर जमीन अधिग्रहण और विकास परियोजनाओं के दौरान होने वाले सामाजिक तनाव की ओर ध्यान आकर्षित करता है।

प्रशासन और समाज के लिए संदेश
यह घटना और उसका न्यायिक निष्कर्ष प्रशासन और समाज दोनों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है। एक ओर जहां विकास परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण जरूरी होता है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों की सहमति और संवाद भी उतना ही आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उस समय बेहतर संवाद और समझदारी से काम लिया जाता, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। साथ ही, कानून व्यवस्था बनाए रखने के दौरान सटीक और निष्पक्ष जांच भी जरूरी है, ताकि निर्दोष लोगों को अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े।

देवघर का यह मामला सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। अदालत का यह निर्णय न्याय प्रणाली में साक्ष्य के महत्व को दर्शाता है और यह भी बताता है कि बिना पुख्ता प्रमाण के किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
आने वाले समय में ऐसे मामलों से सीख लेते हुए प्रशासन को अधिक संवेदनशील और पारदर्शी तरीके से कार्य करना होगा, ताकि विकास और जनहित के बीच संतुलन बना रहे।
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