By: Vikash Kumar Raut (vicky)
नई दिल्ली। वैश्विक प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत ने रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की खरीद में लगातार बढ़ोतरी जारी रखी है। मई महीने में भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूस से कच्चे तेल के आयात में करीब 21 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इस बढ़ोतरी के साथ भारत रूस के तेल का चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया है।

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। इन प्रतिबंधों के कारण यूरोपीय देशों ने रूसी तेल की खरीद को कम कर दिया, जिसके बाद रूस ने एशियाई देशों को रियायती कीमतों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराना शुरू किया। भारत ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और आयात लागत को कम करने के लिए रूसी तेल की खरीद में तेजी लाई।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह रणनीति पूरी तरह आर्थिक हितों पर आधारित है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता देश है, जहां घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात किया जाता है। ऐसे में सस्ती दरों पर मिलने वाला रूसी कच्चा तेल भारत के लिए एक लाभकारी विकल्प साबित हो रहा है।

मई महीने में रूसी तेल की खरीद में आई 21 प्रतिशत की वृद्धि से यह साफ हो गया है कि भारतीय रिफाइनरियां वैश्विक दबाव के बावजूद अपने व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता दे रही हैं। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कई बड़ी भारतीय रिफाइनरियां रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रही हैं और उसे प्रोसेस कर घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति कर रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, रूस से मिलने वाले डिस्काउंट वाले कच्चे तेल की वजह से भारतीय रिफाइनरियों के मुनाफे में भी सुधार हुआ है। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलने के साथ विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाला दबाव भी कम हुआ है। हालांकि, रूस से बढ़ते आयात को लेकर अमेरिका और यूरोप समेत पश्चिमी देशों की नजर लगातार बनी हुई है।

भारत ने हमेशा स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा खरीद नीति राष्ट्रीय हित और उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तय की जाती है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि देश की बड़ी आबादी और बढ़ती ऊर्जा मांग को देखते हुए सस्ते और विश्वसनीय ऊर्जा स्रोतों की उपलब्धता आवश्यक है।
रूस पहले भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल नहीं था, लेकिन वर्ष 2022 के बाद स्थिति तेजी से बदली। युद्ध से पहले भारत के कुल तेल आयात में रूसी हिस्सेदारी बहुत कम थी, लेकिन छूट मिलने के बाद रूस भारत का सबसे बड़ा या प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा। इससे भारत के पारंपरिक आपूर्तिकर्ता मध्य पूर्व के देशों की हिस्सेदारी में भी बदलाव देखने को मिला।

वहीं चीन अब भी रूस के तेल का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। चीन और भारत दोनों ने अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखी है। इससे रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद अपने ऊर्जा निर्यात को बनाए रखने में मदद मिली है।
विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार की स्थिति, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रम और तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के आधार पर भारत की खरीद रणनीति में बदलाव हो सकता है। यदि रूस आगे भी आकर्षक छूट देता रहता है तो भारतीय कंपनियां वहां से तेल आयात को प्राथमिकता दे सकती हैं।

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने पर भी जोर दे रही है। इसके साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा, प्राकृतिक गैस और वैकल्पिक ईंधन के विकास पर भी काम किया जा रहा है, ताकि भविष्य में आयातित तेल पर निर्भरता को कम किया जा सके।

फिलहाल मई महीने के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद भारत की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। वैश्विक दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद भारत अपनी आर्थिक जरूरतों और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में संतुलित रणनीति अपना रहा है।

