By: Mala Mandal
झारखंड के देवघर स्थित विश्व प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समागम का भी अद्भुत उदाहरण है। यहां सदियों से चली आ रही बांग्ला कीर्तन परंपरा आज भी उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ जीवित है, जो इसकी ऐतिहासिक जड़ों को मजबूती देती है।

बांग्ला कीर्तन की शुरुआत 15वीं-16वीं शताब्दी में बंगाल क्षेत्र, यानी वर्तमान पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में हुई थी। इसके सबसे प्रमुख प्रवर्तक श्री चैतन्य महाप्रभु थे, जिन्होंने नबद्वीप से नाम-कीर्तन की परंपरा शुरू कर इसे जन-जन तक पहुंचाया।
इतिहास के पन्नों को देखें तो 15वीं-16वीं शताब्दी में देवघर भी बंगाल क्षेत्र का हिस्सा माना जाता था। यही कारण है कि यहां की संस्कृति, पूजा पद्धति और जीवनशैली पर बंगाली परंपराओं की गहरी छाप आज भी देखने को मिलती है। बाबा धाम में जहां मिथिला संस्कृति का संगम है, वहीं बंगाली कैलेंडर और पूजा विधि का प्रयोग आज भी कई धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
देवघर में कीर्तन परंपरा की शुरुआत लीला आश्रम से मानी जाती है, जहां बंगाल से आए साधु-संतों ने सबसे पहले भजन-कीर्तन का आयोजन शुरू किया। इस आयोजन में बाबा धाम के तीर्थ पुरोहित भी शामिल होते थे। यही से यह परंपरा धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में फैल गई।

इसके बाद देवघर की पहली संगठित कीर्तन मंडली “नदी कीर्तन मंडली” के रूप में सामने आई, जिसकी स्थापना लक्ष्मीपुर चौक स्थित चंद्रावती स्कूल के पास की गई थी। इस मंडली में तीर्थ पुरोहितों ने प्रमुख भूमिका निभाई और धीरे-धीरे इसमें सदस्यों की संख्या बढ़ती चली गई।
समय के साथ कीर्तन का स्वरूप और विस्तार भी बढ़ता गया। वर्तमान में बाबा मंदिर के सिंह द्वार, पूर्व द्वार, पश्चिम द्वार और शिवगंगा के आसपास कीर्तन बैठकी के स्थायी स्थान विकसित हो चुके हैं। विशेष रूप से शिवगंगा के पूर्वी और दक्षिणी छोर पर बने कीर्तन स्थल आज भी इस परंपरा के जीवंत केंद्र बने हुए हैं।
देवघर में आज कई प्रमुख कीर्तन मंडलियां सक्रिय हैं, जिनमें गोपाल कीर्तन मंडली, वसंत कीर्तन मंडली, पांडा कीर्तन मंडली, बम-बम बाबा कीर्तन मंडली, फूलचंद कीर्तन मंडली और मसानी कीर्तन मंडली प्रमुख हैं। ये मंडलियां साल भर विभिन्न अवसरों पर भजन-कीर्तन का आयोजन करती हैं और भक्तों को भक्ति रस में डुबो देती हैं।

खासतौर पर कार्तिक माह में इन मंडलियों द्वारा प्रभात फेरी का आयोजन किया जाता है, जिसमें भोर होते ही भजन-कीर्तन की ध्वनि पूरे शहर में गूंज उठती है। वहीं वैशाख माह में पूरे महीने चलने वाले “मासव्यापी कीर्तन” का आयोजन बाबा मंदिर प्रांगण में किया जाता है, जो भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होता है।
इन कीर्तन मंडलियों की सबसे खास बात यह है कि यहां बहुभाषी भजन-कीर्तन प्रस्तुत किए जाते हैं। बांग्ला के साथ-साथ हिंदी, खोरठा, भोजपुरी, खेमटा और झूमर जैसे लोकगीतों के माध्यम से भक्ति का संदेश दिया जाता है। यह विविधता ही बाबा धाम की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती है।
कीर्तन प्रेमी पूरे वर्ष वैशाख माह का इंतजार करते हैं, जब प्रतिदिन संध्या समय मंदिर प्रांगण में भव्य कीर्तन का आयोजन होता है। श्रद्धालु लगभग 10 किलोमीटर दूर-दूर से यहां केवल भजन सुनने के लिए पहुंचते हैं और भक्ति रस का आनंद लेते हैं।

हर कीर्तन मंडली का अपना निश्चित दिन और शैली होती है। बम-बम बाबा कीर्तन मंडली के प्रमुख गायक वधु बाबा, मिट्ठू द्वारी, रुद्र दत्त द्वारी और अन्य कलाकार गुरुवार और शुक्रवार को अपनी प्रस्तुति देते हैं। वहीं वसंत कीर्तन मंडली बुधवार को बुवा सरकार और उनके साथियों के साथ भक्तिमय माहौल बनाती है।
पांडा कीर्तन मंडली रविवार को मोहन नारेन, मुनी लाल और सीताराम पंडित जैसे कलाकारों के साथ भजन प्रस्तुत करती है। फूलचंद कीर्तन मंडली सोमवार को रात 8 बजे से देर रात तक किशोर तिवारी और छोटू खबाड़े के नेतृत्व में कार्यक्रम आयोजित करती है।
मसानी कीर्तन मंडली शनिवार को अशोक मिश्रा और अन्य कलाकारों के साथ अपनी प्रस्तुति देती है, जबकि गोपाल कीर्तन मंडली मंगलवार को अरुण झा, हीरो झा और वीरेश वर्मा जैसे कलाकारों के साथ भक्ति की धारा बहाती है।

कीर्तन में उपयोग किए जाने वाले वाद्य यंत्र भी इसकी विशेषता हैं। हारमोनियम, तबला, खोल, ढोल और करताल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है, जो वातावरण को और अधिक भक्तिमय बना देता है।
यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी अपने प्रारंभिक दौर में थी।

हर कीर्तन मंडली अपने कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना से करती है और इसके बाद भक्ति गीतों की श्रृंखला शुरू होती है। कीर्तन के दौरान मंदिर प्रांगण में स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज से आए श्रद्धालु भी शामिल होते हैं और भक्ति में लीन हो जाते हैं।
देवघर का यह कीर्तन परंपरा न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का काम भी करता है।

