By: Mala Mandal
दिल्ली में एक बार फिर ट्रांसपोर्ट व्यवस्था पर बड़ा संकट मंडराता दिखाई दे रहा है। राजधानी के ट्रांसपोर्टरों और ऑटो चालकों ने 21 मई से 23 मई तक हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी है। अगर यह हड़ताल होती है तो लाखों यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। खासकर ऑफिस जाने वाले लोग, स्कूल-कॉलेज के छात्र और रोजाना सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर रहने वाले नागरिकों की मुश्किलें काफी बढ़ सकती हैं।

जानकारी के मुताबिक ट्रांसपोर्ट यूनियनों और ऑटो चालक संगठनों ने अपनी कई मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि लंबे समय से उनकी समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिसके चलते अब मजबूर होकर आंदोलन और हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
बताया जा रहा है कि इस प्रस्तावित हड़ताल में ऑटो चालक, टैक्सी चालक और कुछ ट्रांसपोर्ट संगठन शामिल हो सकते हैं। यदि सभी यूनियनें एकजुट होकर हड़ताल करती हैं तो दिल्ली की सड़कों पर परिवहन व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

ट्रांसपोर्ट यूनियनों की मुख्य मांगों में बढ़ती महंगाई के बीच राहत, डीजल और सीएनजी की कीमतों में कमी, चालान नियमों में बदलाव, परमिट संबंधी समस्याओं का समाधान और ट्रांसपोर्ट कारोबार से जुड़े कई प्रशासनिक मुद्दों का निपटारा शामिल बताया जा रहा है। ऑटो चालकों का कहना है कि लगातार बढ़ते खर्चों के कारण उनकी कमाई पर असर पड़ा है और परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।

यूनियनों का यह भी कहना है कि सरकार द्वारा लागू किए गए कुछ नियम छोटे वाहन चालकों और ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं। कई बार भारी जुर्माने और सख्त नियमों के चलते चालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में वे सरकार से राहत और स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।

हड़ताल की चेतावनी के बाद दिल्ली सरकार और प्रशासन की चिंता भी बढ़ गई है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में सरकार और यूनियनों के बीच बातचीत हो सकती है ताकि इस हड़ताल को टाला जा सके। अगर बातचीत सफल नहीं होती है तो दिल्लीवासियों को 21 से 23 मई के बीच भारी ट्रैफिक और परिवहन संकट का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में सार्वजनिक परिवहन का रुकना आम लोगों के लिए बड़ी परेशानी पैदा कर सकता है। दिल्ली में हर दिन लाखों लोग ऑटो, टैक्सी और अन्य सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में तीन दिन की हड़ताल का असर बाजारों, दफ्तरों और स्कूलों तक देखने को मिल सकता है।

संभावना जताई जा रही है कि रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और मेट्रो स्टेशनों के बाहर यात्रियों की भीड़ बढ़ सकती है। ऑटो और टैक्सी सेवाएं प्रभावित होने से लोगों को निजी वाहनों या अन्य विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। इससे ट्रैफिक जाम की समस्या भी बढ़ सकती है।
उधर, आम लोगों ने भी सरकार से जल्द समाधान निकालने की मांग की है। कई यात्रियों का कहना है कि अगर हड़ताल होती है तो उन्हें दफ्तर पहुंचने और रोजमर्रा के काम निपटाने में दिक्कत होगी। छात्रों और बुजुर्गों के लिए भी यह स्थिति परेशानी का कारण बन सकती है।

फिलहाल सभी की नजर सरकार और यूनियनों के बीच होने वाली संभावित बातचीत पर टिकी हुई है। यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति बन जाती है तो हड़ताल टल सकती है। लेकिन अगर बातचीत बेनतीजा रहती है तो दिल्ली की जनता को आने वाले दिनों में परिवहन संकट झेलना पड़ सकता है।
अब देखना होगा कि सरकार ट्रांसपोर्टरों और ऑटो चालकों की मांगों पर क्या फैसला लेती है और क्या राजधानी दिल्ली में प्रस्तावित यह हड़ताल टल पाएगी या नहीं।

