By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच हुई कूटनीतिक प्रगति ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत की उम्मीद दी है। दोनों देशों के बीच समझौते के बाद दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के फिर से सामान्य रूप से संचालित होने की संभावना बढ़ गई है। इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा लाभ भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों को मिल सकता है, जो अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा करते हैं।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला एक रणनीतिक समुद्री मार्ग है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों से तेल और गैस की आपूर्ति इसी जलडमरूमध्य के माध्यम से वैश्विक बाजारों तक पहुंचती है।
हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के कारण इस क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताएं पैदा हो गई थीं। कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने अतिरिक्त जोखिम शुल्क लगाना शुरू कर दिया था। इससे तेल परिवहन की लागत बढ़ गई थी और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव देखने को मिला था।

अब दोनों देशों के बीच समझौते और तनाव में कमी के संकेत मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह सामान्य रूप से संचालित होता है तो तेल आपूर्ति श्रृंखला में स्थिरता आएगी और परिवहन लागत में कमी देखने को मिलेगी।
भारत के लिए यह खबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता देशों में सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। इन देशों से आने वाला अधिकांश तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरता है।

यदि इस मार्ग पर किसी प्रकार का अवरोध या सुरक्षा संकट उत्पन्न होता है तो भारत को तेल आयात के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। साथ ही शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त बीमा और जोखिम शुल्क भी वसूलती हैं, जिसका सीधा असर आयात लागत पर पड़ता है। लेकिन समझौते के बाद स्थिति सामान्य होने पर यह अतिरिक्त बोझ कम हो सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार तेल की कीमतों में स्थिरता आने से भारत के व्यापार घाटे पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतें कम रहने से विदेशी मुद्रा पर दबाव घटेगा और सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी।

महंगाई के मोर्चे पर भी यह घटनाक्रम राहत देने वाला माना जा रहा है। भारत में परिवहन, उत्पादन और लॉजिस्टिक्स की लागत काफी हद तक ईंधन की कीमतों पर निर्भर करती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होता है तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव कम होगा। इसका असर खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं और अन्य आवश्यक उत्पादों की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल कीमतों में गिरावट से भारतीय रिजर्व बैंक को भी महंगाई नियंत्रण में मदद मिलेगी। इससे ब्याज दरों को लेकर नीति निर्माण में अधिक लचीलापन मिल सकता है और आर्थिक विकास को गति देने के प्रयासों को बल मिलेगा।

शिपिंग उद्योग को भी इस समझौते से लाभ होने की उम्मीद है। पिछले कुछ समय से क्षेत्रीय तनाव के कारण समुद्री माल ढुलाई दरों में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। अब जोखिम कम होने से जहाज संचालन की लागत में कमी आ सकती है, जिसका फायदा वैश्विक व्यापार और आयात-निर्यात गतिविधियों को मिलेगा।

हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि स्थिति पर अभी भी सतर्क नजर बनाए रखने की जरूरत है। मध्य पूर्व का भू-राजनीतिक परिदृश्य बेहद संवेदनशील माना जाता है और किसी भी नए तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तुरंत पड़ सकता है। फिर भी वर्तमान समझौता क्षेत्र में स्थिरता और आर्थिक राहत की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

कुल मिलाकर अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के फिर से सामान्य रूप से खुलने की संभावना भारत सहित दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं के लिए राहत भरी खबर है। इससे तेल आपूर्ति में सुधार, माल ढुलाई लागत में कमी, महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। आने वाले दिनों में वैश्विक बाजार की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय स्थिरता इस राहत की वास्तविक सीमा तय करेगी।

