By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
हिंद महासागर क्षेत्र में भारत अपनी समुद्री रणनीति को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। भारत और इंडोनेशिया मिलकर हिंद महासागर में एक ऐसे रणनीतिक समुद्री गलियारे के विकास पर काम कर रहे हैं, जिसे कई विशेषज्ञ “भारत का होर्मुज” बता रहे हैं। इसका उद्देश्य हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक गतिविधियों और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाना है।

वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरों के बीच भारत और इंडोनेशिया की यह साझेदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दोनों देशों के बीच समुद्री सहयोग, रक्षा साझेदारी और रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर लगातार बातचीत चल रही है।
क्या है ‘भारत का होर्मुज’?
दुनिया में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। इसी तर्ज पर भारत और इंडोनेशिया हिंद महासागर में एक ऐसा रणनीतिक समुद्री केंद्र विकसित करना चाहते हैं, जो व्यापारिक जहाजों, नौसैनिक गतिविधियों और ऊर्जा आपूर्ति के लिए सुरक्षित विकल्प प्रदान कर सके। विशेषज्ञों का मानना है कि इंडोनेशिया के सबांग बंदरगाह और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की सामरिक स्थिति इस योजना को बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। दोनों स्थान मिलकर मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर रणनीतिक बढ़त देते हैं।

सबांग बंदरगाह क्यों है खास?
इंडोनेशिया का सबांग पोर्ट हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक पर स्थित है। भारत पहले से ही इस बंदरगाह के विकास में सहयोग कर रहा है। यदि इस क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग और मजबूत होता है तो भारत की नौसैनिक पहुंच बढ़ेगी, समुद्री निगरानी बेहतर होगी और आपातकालीन परिस्थितियों में जहाजों को वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराया जा सकेगा।

भारत को क्या मिलेगा फायदा?
इस रणनीतिक साझेदारी से भारत को कई महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं—
– हिंद महासागर में नौसैनिक उपस्थिति मजबूत होगी।
– समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा बढ़ेगी।
– ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का खतरा कम होगा।
– इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक भूमिका मजबूत होगी।
– चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियों पर संतुलन बनाने में मदद मिलेगी।
– अंडमान-निकोबार कमांड की रणनीतिक उपयोगिता और बढ़ेगी।

इंडोनेशिया को क्या होगा लाभ?
इंडोनेशिया भी इस साझेदारी से आर्थिक और सुरक्षा दोनों स्तरों पर लाभान्वित होगा। बंदरगाहों का विकास, निवेश, समुद्री व्यापार और रक्षा सहयोग बढ़ने से उसकी क्षेत्रीय भूमिका मजबूत होगी। इसके अलावा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में भी सहयोग मिलेगा।

चीन की बढ़ती मौजूदगी बनी चिंता
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी गतिविधियां तेजी से बढ़ाई हैं। कई देशों में बंदरगाह परियोजनाओं और नौसैनिक सहयोग के जरिए वह अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत कर रहा है। ऐसे में भारत अपने मित्र देशों के साथ मिलकर समुद्री सुरक्षा नेटवर्क को मजबूत करने की नीति पर आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत-इंडोनेशिया सहयोग किसी एक देश के खिलाफ नहीं बल्कि मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ेगा सहयोग
भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” और “सागर (Security and Growth for All in the Region)” विजन के तहत इंडोनेशिया के साथ सहयोग लगातार बढ़ रहा है। दोनों देश संयुक्त नौसैनिक अभ्यास, समुद्री निगरानी, आपदा प्रबंधन और समुद्री कानूनों के पालन पर भी साथ काम कर रहे हैं।
वैश्विक व्यापार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कदम?
विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यदि इन समुद्री मार्गों पर किसी प्रकार की बाधा आती है तो पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। ऐसे में भारत और इंडोनेशिया का यह सहयोग वैश्विक व्यापार की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत और इंडोनेशिया के बीच हिंद महासागर में रणनीतिक सहयोग केवल दो देशों की साझेदारी नहीं बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, स्थिरता और आर्थिक विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम है। यदि यह परियोजना तय योजना के अनुसार आगे बढ़ती है तो आने वाले वर्षों में भारत की समुद्री शक्ति और वैश्विक रणनीतिक भूमिका दोनों को नई मजबूती मिल सकती है।

