By: Mala Mandal
Devshayani Ekadashi 2026: सनातन धर्म में देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पावन पर्व चातुर्मास की शुरुआत का प्रतीक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योग निद्रा में चले जाते हैं और अगले चार महीनों तक विश्राम करते हैं। इसी कारण इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। इस वर्ष देवशयनी एकादशी का व्रत आज रखा जा रहा है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने और उनकी प्रिय वस्तुओं का भोग लगाने से सुख-समृद्धि, धन, वैभव और परिवार में खुशहाली का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व
देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी और पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में प्रवेश करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के दिन जागते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है, जो साधना, भक्ति, जप, तप, दान और आत्मचिंतन के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं।

आज क्यों विशेष है यह दिन?
मान्यता है कि देवशयनी एकादशी पर किया गया व्रत और पूजा कई गुना अधिक फलदायी होती है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन की आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं, घर में सुख-शांति बनी रहती है और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं और श्रीहरि को उनकी प्रिय वस्तुएं अर्पित करते हैं।

भगवान विष्णु को जरूर लगाएं इन प्रिय चीजों का भोग
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को पीले रंग की मिठाइयां, केसर युक्त खीर, पंचामृत, तुलसी दल, पीले फल, केले, माखन-मिश्री, सूखे मेवे, चने की दाल से बने व्यंजन, बेसन के लड्डू और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु का भोग अधूरा माना जाता है, इसलिए भोग में तुलसी के पत्ते अवश्य शामिल करें।

तुलसी का विशेष महत्व
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का स्थान सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि श्रीहरि तुलसी के बिना भोग स्वीकार नहीं करते। इसलिए पूजा के दौरान तुलसी दल अर्पित करने से पूजा पूर्ण मानी जाती है और विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा
देवशयनी एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ पीले या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद दीपक जलाएं, पीले फूल अर्पित करें, चंदन का तिलक लगाएं, तुलसी दल चढ़ाएं और विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें। अंत में भगवान को प्रिय भोग अर्पित कर आरती करें और प्रसाद परिवार में वितरित करें।

चातुर्मास में किन कार्यों से बचना चाहिए?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यापार का शुभारंभ, मुंडन, यज्ञोपवीत और अन्य बड़े मांगलिक कार्यों को टालने की परंपरा है। हालांकि इस अवधि में भगवान की भक्ति, दान-पुण्य, धार्मिक अनुष्ठान, जप-तप और सत्संग करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

देवउठनी एकादशी पर होगा योग निद्रा का समापन
चार माह की योग निद्रा के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु जागते हैं। इसी दिन से सभी शुभ और मांगलिक कार्य दोबारा शुरू हो जाते हैं। इसलिए देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक का समय आध्यात्मिक साधना और आत्मिक उन्नति के लिए विशेष माना जाता है।

यह लेख धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है। विभिन्न परंपराओं और क्षेत्रों में पूजा-पद्धति एवं मान्यताओं में अंतर हो सकता है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को करने से पहले अपने परिवार के परंपरागत नियमों या योग्य आचार्य की सलाह अवश्य लें।

