By: Mala Mandal
Randhan Chhath 2026: हिंदू धर्म में कई ऐसे पर्व और व्रत हैं, जिनसे धार्मिक आस्था के साथ-साथ पुरानी परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं। इन्हीं में से एक है रांधण छठ। गुजरात में रांधण छठ का पर्व विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से माता शीतला को समर्पित माना जाता है। इस दिन महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा की कामना से माता शीतला की पूजा-अर्चना करती हैं। रांधण छठ के दिन घरों में एक खास परंपरा निभाई जाती है। इस दिन महिलाएं अगले दिन यानी शीतला सातम के लिए भोजन पहले से बनाकर तैयार कर लेती हैं। मान्यता है कि शीतला सातम के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और माता शीतला को ठंडे भोजन का भोग लगाया जाता है। इसी वजह से रांधण छठ के दिन घरों में तरह-तरह के पकवान और भोजन तैयार किए जाते हैं।

रांधण छठ 2026 कब है?
रांधण छठ भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। गुजरात और कुछ अन्य क्षेत्रों में इस दिन को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। इसके अगले दिन शीतला सातम का पर्व मनाया जाता है। रांधण छठ का मुख्य उद्देश्य माता शीतला की पूजा करना और अगले दिन के लिए भोजन की तैयारी करना माना जाता है। क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार तिथि और पूजा के समय में कुछ अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना उचित है।
रांधण छठ के दिन क्यों बनाया जाता है भोजन?
रांधण छठ की सबसे खास बात यही है कि इस दिन अगले दिन के लिए भोजन तैयार किया जाता है। परिवार की महिलाएं घर में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाती हैं और उन्हें सुरक्षित रखती हैं। इनमें खिचड़ी, पूरी, सब्जी, मिठाई, पकवान और अन्य पारंपरिक व्यंजन शामिल हो सकते हैं। इसके पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि शीतला सातम के दिन चूल्हा जलाकर भोजन नहीं बनाया जाता। उस दिन माता शीतला को पहले से तैयार और ठंडे भोजन का भोग लगाने की परंपरा है।

शीतला सातम के दिन चूल्हा क्यों नहीं जलाया जाता?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता शीतला को शीतलता और स्वास्थ्य की देवी माना जाता है। शीतला सातम के दिन घर में अग्नि प्रज्वलित न करने और ठंडे भोजन का सेवन करने की परंपरा इसी धार्मिक भाव से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि माता शीतला की पूजा करने और उनके नियमों का पालन करने से परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है तथा रोग और मौसमी बीमारियों से रक्षा होती है। यह एक पारंपरिक धार्मिक विश्वास है, जिसका पालन अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से किया जाता है।
रांधण छठ पर माता शीतला की पूजा का महत्व
रांधण छठ के दिन माता शीतला की पूजा विशेष रूप से की जाती है। महिलाएं सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनती हैं और पूजा की तैयारी करती हैं। इसके बाद माता शीतला को जल, रोली, अक्षत, फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के दौरान परिवार के अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है। कई स्थानों पर महिलाएं इस दिन व्रत भी रखती हैं। व्रत और पूजा के नियम परिवार तथा स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

रांधण छठ की पूजा विधि
सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और घर की साफ-सफाई करें। इसके बाद पूजा स्थल को स्वच्छ करके माता शीतला की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें।
माता शीतला को जल अर्पित करें। इसके बाद रोली, अक्षत, फूल और फल चढ़ाएं। अपनी परंपरा के अनुसार माता को भोग अर्पित करें।
इसके बाद शीतला माता की कथा का श्रवण या पाठ करें। परिवार के सभी सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
पूजा समाप्त होने के बाद माता की आरती करें और प्रसाद परिवार के सदस्यों में बांटें।

रांधण छठ पर क्या-क्या बनता है?
गुजरात में रांधण छठ के अवसर पर घरों में अलग-अलग पारंपरिक पकवान तैयार करने की परंपरा है। अगले दिन भोजन बनाने की आवश्यकता न पड़े, इसलिए महिलाएं एक दिन पहले ही पर्याप्त भोजन तैयार कर लेती हैं। क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार पूरी, सब्जी, खिचड़ी, मिठाई, थेपला, विभिन्न प्रकार के पकवान और अन्य व्यंजन बनाए जा सकते हैं। इन व्यंजनों को अगले दिन शीतला माता को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
रांधण छठ का धार्मिक संदेश
रांधण छठ केवल भोजन बनाने का पर्व नहीं है। इसके पीछे परिवार, स्वास्थ्य और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव भी जुड़ा हुआ माना जाता है। इस दिन परिवार की महिलाएं घर-परिवार की सुख-शांति और सभी सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं। वहीं अगले दिन चूल्हा न जलाने की परंपरा को माता शीतला के प्रति श्रद्धा और शीतलता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

माता शीतला को क्यों माना जाता है रोगों की देवी?
हिंदू धार्मिक मान्यताओं में माता शीतला को विशेष रूप से रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। प्राचीन समय में चेचक जैसी बीमारियों और मौसमी रोगों को लेकर समाज में कई धार्मिक परंपराएं विकसित हुईं। शीतला माता की पूजा भी इन्हीं लोक-धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। आज भी कई परिवार श्रद्धा के साथ शीतला माता की पूजा करते हैं और उनसे परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
रांधण छठ के दिन किन बातों का रखें ध्यान?
रांधण छठ पर घर की साफ-सफाई और पूजा की तैयारी विशेष रूप से की जाती है। भोजन बनाते समय स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए। अगले दिन खाने के लिए बनाए गए भोजन को सुरक्षित और स्वच्छ तरीके से रखना जरूरी है। अगर किसी परिवार में शीतला सातम के दिन चूल्हा न जलाने की परंपरा है, तो उसी के अनुसार भोजन पहले से तैयार किया जाता है। हालांकि खान-पान से जुड़े किसी भी नियम को स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार समझदारी से अपनाना चाहिए।

रांधण छठ 2026: एक नजर में
पर्व: रांधण छठ
समर्पित: माता शीतला
मुख्य क्षेत्र: गुजरात और कुछ अन्य क्षेत्र
तिथि: भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी
मुख्य परंपरा: अगले दिन के लिए भोजन तैयार करना
अगला पर्व: शीतला सातम
विशेष मान्यता: शीतला सातम के दिन चूल्हा न जलाना और ठंडे भोजन का भोग लगाना

रांधण छठ क्यों है खास?
रांधण छठ गुजरात की लोक-संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ पर्व है। इस दिन घर में भोजन बनाने की परंपरा अगले दिन की धार्मिक मान्यता से जुड़ी है। माता शीतला की पूजा के माध्यम से परिवार की सुख-शांति और स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि जहां आम दिनों में भोजन ताजा बनाने की तैयारी होती है, वहीं रांधण छठ पर अगले दिन के लिए पहले से भोजन तैयार करने की परंपरा निभाई जाती है। यही वजह है कि गुजरात में इस पर्व का अलग ही धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है।

यह लेख धार्मिक मान्यताओं, लोक परंपराओं और प्रचलित पंचांग संबंधी जानकारी पर आधारित है। रांधण छठ और शीतला सातम की पूजा-विधि, व्रत के नियम और शुभ मुहूर्त अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों की परंपराओं के अनुसार अलग हो सकते हैं। भोजन से संबंधित मान्यताओं को स्वास्थ्य संबंधी सलाह न समझें। किसी भी स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता दें। Newsbag धार्मिक मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं करता।

