By: Mala Mandal
देवघर। विश्वप्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम में सदियों से चली आ रही सनातन एवं प्राचीन स्पर्श पूजा परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए श्रद्धालुओं के लिए सुविधाजनक, सुरक्षित और सुव्यवस्थित पूजा-दर्शन व्यवस्था लागू करने की मांग उठी है। इस संबंध में झारखंड के मुख्यमंत्री सह अध्यक्ष, बाबा बैद्यनाथ-बासुकीनाथ धाम तीर्थ विकास प्राधिकार को पत्र भेजकर मंदिर की धार्मिक परंपराओं और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने का आग्रह किया गया है।

पत्र में कहा गया है कि देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक और 51 शक्तिपीठों में हृदय पीठ के रूप में प्रसिद्ध है। यह करोड़ों सनातन श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में यहां की पूजा-पद्धति और स्पर्श पूजा केवल धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही तीर्थ परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
स्मरण और दर्शन के साथ प्रत्यक्ष संपर्क का भी महत्व
पत्र में सनातन धर्म की पूजा परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि स्मरण, दर्शन, नाम-जप, स्नान, स्पर्श और प्रत्यक्ष उपासना का अपना-अपना आध्यात्मिक महत्व है। गंगा के स्मरण मात्र की महिमा का उल्लेख करते हुए यह तर्क दिया गया है कि यदि केवल स्मरण ही पर्याप्त होता तो करोड़ों श्रद्धालु गंगा तट तक जाकर स्नान करने और गंगाजल ग्रहण करने के लिए कठिन यात्रा नहीं करते। इसी संदर्भ में बाबा बैद्यनाथ धाम की कांवर यात्रा का उदाहरण दिया गया है। मंदिर परिसर में गंगाजल उपलब्ध होने के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु उत्तरवाहिनी गंगा से स्वयं जल लेकर सैकड़ों किलोमीटर की कठिन यात्रा करते हुए देवघर पहुंचते हैं। वे कई दिनों तक पैदल यात्रा करते हैं, कांवर उठाते हैं और उसी जल को बाबा बैद्यनाथ के ज्योतिर्लिंग पर अर्पित करते हैं।

पत्र के अनुसार कांवरियों के लिए वह गंगाजल सिर्फ जल नहीं, बल्कि उनके संकल्प, तपस्या, श्रम, भावना और भक्ति का प्रतीक होता है। इसी प्रकार बाबा बैद्यनाथ धाम की स्पर्श पूजा भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक अनुभूति रखती है। इसलिए केवल दूर से दर्शन या अरघा के माध्यम से जल अर्पित करने और परंपरागत तरीके से बाबा के समीप जाकर पूजा करने की अनुभूति को एक समान नहीं माना जा सकता।
भीड़ प्रबंधन के नाम पर परंपरा समाप्त नहीं हो
पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा या प्रशासनिक सुविधा के नाम पर सदियों पुरानी स्पर्श पूजा परंपरा को समाप्त करना उचित नहीं होगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और भीड़ नियंत्रण के लिए आवश्यक प्रशासनिक व्यवस्थाओं का विरोध नहीं है। मांग केवल इतनी है कि प्रशासनिक व्यवस्था ऐसी हो, जिससे परंपरा सुरक्षित और सुव्यवस्थित तरीके से जारी रह सके।

कांवरियों को सीधे मंदिर तक पहुंचाने की मांग
पत्र में कांवरियों के लिए सीधी और सुविधाजनक व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया गया है। मानसरोवर स्थित क्यू कॉम्प्लेक्स या प्रतीक्षा स्थल से सुव्यवस्थित कतार के माध्यम से कांवरियों को सीधे बाबा मंदिर के गर्भगृह तक ले जाकर जलाभिषेक कराने की व्यवस्था की मांग की गई है। इससे श्रद्धालुओं को अनावश्यक रूप से अलग-अलग स्थानों पर घूमने से राहत मिलने और भीड़ प्रबंधन बेहतर होने की बात कही गई है।

संस्कार मंडप का धार्मिक उपयोग बनाए रखने पर जोर
संस्कार मंडप को उसके मूल धार्मिक उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखने की मांग भी की गई है। पत्र में कहा गया है कि मुंडन, उपनयन, विवाह और अन्य धार्मिक संस्कारों के लिए संस्कार मंडप का पूर्व की तरह उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसे अनावश्यक रूप से भीड़ प्रबंधन के लिए इस्तेमाल नहीं करने का आग्रह किया गया है।
शीघ्र दर्शनम् के लिए बेहतर प्रतीक्षालय की मांग
शीघ्र दर्शनम् के श्रद्धालुओं को सड़क या मंदिर के बाहर लंबी कतार में खड़ा करने के बजाय पाठक धर्मशाला अथवा उमा भवन में उपलब्ध प्रतीक्षालय और कमरों का उपयोग करने का सुझाव दिया गया है। यहां बिजली, पंखा, पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की गई है। पत्र में कहा गया है कि इससे श्रद्धालुओं को राहत मिलने के साथ-साथ सड़क पर भीड़ और यातायात का दबाव कम किया जा सकता है।

प्रोटोकॉल पूजा के लिए समय और शुल्क व्यवस्था
प्रोटोकॉल पूजा एवं दर्शन के लिए प्रतिदिन एक से दो घंटे की निर्धारित समय-सीमा तय करने का सुझाव दिया गया है। इसके साथ ही नियमानुसार कूपन या शुल्क व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और मंदिर अथवा सरकार के राजस्व को नुकसान न पहुंचे। प्रोटोकॉल व्यवस्था के लिए अलग पुलिस बल और सुरक्षाकर्मियों की तैनाती का भी सुझाव दिया गया है। पत्र में कहा गया है कि प्रोटोकॉल पूजा के बाद इन कर्मियों को मंदिर की सामान्य व्यवस्था से अलग कर दिया जाना चाहिए, ताकि आम श्रद्धालुओं की सुरक्षा और शीघ्र दर्शन व्यवस्था प्रभावित न हो।

संयुक्त समन्वय समिति बनाने की मांग
प्रोटोकॉल पूजा एवं दर्शन की व्यवस्था के लिए जिला प्रशासन, मंदिर प्रबंधन और पंडा धर्मरक्षिणी सभा के प्रतिनिधियों की संयुक्त समन्वय समिति गठित करने का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा मंदिर की पूजा-पद्धति और धार्मिक व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले पंडा समाज, तीर्थ पुरोहितों, विद्वान आचार्यों और परंपरा के जानकार प्रतिनिधियों से आवश्यक परामर्श करने की मांग की गई है।

आधुनिक तकनीक अपनाने की बात, लेकिन परंपरा में हस्तक्षेप नहीं
पत्र में डिजिटल पंजीकरण, स्लॉट व्यवस्था, वैज्ञानिक कतार प्रबंधन, सीसीटीवी, डिजिटल सूचना प्रणाली और अन्य आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल का समर्थन किया गया है। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि तकनीक का उद्देश्य श्रद्धालुओं की सुविधा और भीड़ नियंत्रण होना चाहिए, न कि बाबा बैद्यनाथ धाम की सनातन पूजा-पद्धति में अनावश्यक बदलाव करना।
पत्र के अंत में कहा गया है कि किसी तीर्थ की पहचान केवल भवन, सड़क, कॉरिडोर या प्रशासनिक व्यवस्था से नहीं होती, बल्कि उसकी जीवंत धार्मिक परंपराओं और श्रद्धालुओं की आस्था से होती है। बाबा बैद्यनाथ धाम की विशिष्टता भक्त और भगवान के बीच निकटता एवं आत्मीयता की अनुभूति में है।
ऐसे में मांग की गई है कि परंपरा में बदलाव करने के बजाय व्यवस्था में सुधार किया जाए। बाबा बैद्यनाथ धाम की स्पर्श पूजा परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए आधुनिक, सुरक्षित, पारदर्शी और श्रद्धालु-केंद्रित व्यवस्था विकसित की जाए, ताकि मंदिर की धार्मिक गरिमा भी बनी रहे और देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर पूजा-दर्शन की सुविधा मिल सके।
पत्र में स्पष्ट संदेश दिया गया है कि बाबा बैद्यनाथ धाम की परंपरा में परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार ही समय की आवश्यकता है।

