By: Mala Mandal
मृत्यु के बाद शव को अंतिम संस्कार से पहले जमीन पर रखने की परंपरा हिंदू धर्म की प्राचीन परंपराओं में बताई जाती है। आमतौर पर जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो अंतिम संस्कार की तैयारियों से पहले उसके पार्थिव शरीर को कुछ समय के लिए जमीन पर लिटाया जाता है। बहुत से लोगों के मन में सवाल आता है कि जब घर में चारपाई, बिस्तर या अन्य स्थान मौजूद हैं, तो शव को जमीन पर रखने की आवश्यकता क्यों होती है? सनातन धर्म की मान्यताओं में मृत्यु को जीवन का अंतिम पड़ाव होने के साथ-साथ आत्मा की एक नई यात्रा से भी जोड़कर देखा जाता है। वहीं शरीर को पंचमहाभूतों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना माना गया है। मृत्यु के बाद शरीर के इन्हीं तत्वों में विलीन होने की बात धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में कही गई है। शव को जमीन पर रखने की परंपरा को भी इसी धार्मिक और आध्यात्मिक विचार से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और परिवारों में मृत्यु के बाद की रस्मों में अंतर हो सकता है।

पंचतत्वों से बना माना गया है मानव शरीर
सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार मानव शरीर पंचमहाभूतों से निर्मित है। पृथ्वी शरीर को स्थूलता और आधार प्रदान करती है, जल शरीर में तरलता का प्रतीक माना जाता है, अग्नि ऊर्जा और ताप से जुड़ी है, वायु सांस और गति का प्रतीक मानी जाती है, जबकि आकाश को शरीर में मौजूद स्थान या विस्तार से जोड़ा जाता है। इसी वजह से मृत्यु के बाद शरीर को प्रकृति को वापस सौंपने की अवधारणा हिंदू धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण मानी जाती है। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी इसी विचार से जुड़ी हुई बताई जाती है कि शरीर अंततः प्रकृति के तत्वों में वापस विलीन हो जाता है।

मृत्यु के बाद शव को जमीन पर रखने की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद शव को जमीन पर लिटाने को शरीर की प्रकृति की ओर वापसी का प्रतीक माना जाता है। जिस पृथ्वी पर व्यक्ति ने अपना जीवन बिताया और जिस मिट्टी से उसका शरीर जुड़ा हुआ माना गया, मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर को उसी धरती के संपर्क में रखने की परंपरा को इसी भाव से देखा जाता है। यह रस्म केवल एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच के अंतर को समझाने वाली आध्यात्मिक परंपरा के रूप में भी देखी जाती है।

धरती से जुड़ाव का देता है संदेश
शव को जमीन पर रखने की परंपरा का एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश इंसान के धरती से जुड़े होने को लेकर भी माना जाता है। व्यक्ति जीवन में चाहे कितना भी धन कमाए, बड़ा पद हासिल करे या समाज में कितनी भी प्रतिष्ठा प्राप्त करे, मृत्यु के बाद सांसारिक उपलब्धियां उसके साथ नहीं जातीं। अंत में शरीर को प्रकृति को ही सौंप दिया जाता है। यही कारण है कि इस परंपरा को मनुष्य को अहंकार से दूर रहने और अपनी वास्तविक प्रकृति को समझने का संदेश देने वाला माना जाता है।

जीवन की नश्वरता की याद दिलाती है यह परंपरा
मृत्यु के बाद किए जाने वाले संस्कार केवल मृत व्यक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि पीछे रह गए लोगों के लिए भी एक संदेश माने जाते हैं। शव को धरती पर रखा जाना जीवित लोगों को जीवन की नश्वरता का एहसास कराने वाली परंपरा के रूप में देखा जाता है। मनुष्य जीवनभर धन, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा और सुख-सुविधाओं के पीछे भागता है, लेकिन मृत्यु के बाद इनमें से कोई भी चीज उसके साथ नहीं जाती। धार्मिक मान्यताओं में व्यक्ति के कर्मों को ही उसकी वास्तविक पहचान से जोड़ा गया है।

गरुड़ पुराण में मृत्यु और शरीर को लेकर क्या मान्यता है?
हिंदू धर्म में गरुड़ पुराण को मृत्यु, आत्मा, कर्म और मृत्यु के बाद की यात्रा से जुड़े विषयों के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ माना जाता है। इसके प्रेतकल्प आदि प्रसंगों में मृत्यु के बाद की अवस्थाओं और अंत्येष्टि से संबंधित धार्मिक मान्यताओं का वर्णन मिलता है। हालांकि शव को जमीन पर रखने की हर स्थानीय परंपरा को सीधे गरुड़ पुराण के किसी एक श्लोक या निर्देश से जोड़ना उचित नहीं होगा। अलग-अलग हिंदू परंपराओं में अंतिम संस्कार और मृत्यु के बाद की रस्मों की विधि अलग हो सकती है। इसलिए इस परंपरा को व्यापक धार्मिक मान्यताओं और पंचतत्व की अवधारणा के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।

शरीर प्रकृति को और आत्मा अपनी यात्रा पर
सनातन दर्शन में शरीर और आत्मा को अलग-अलग अवधारणाओं के रूप में समझाया जाता है। शरीर को नश्वर माना गया है, जबकि आत्मा को शाश्वत बताया गया है। इसी विचार के अनुसार मृत्यु के बाद शरीर का अंतिम संस्कार किया जाता है और आत्मा की आगे की यात्रा की मान्यता रखी जाती है। शव को जमीन पर रखने की परंपरा को इसी भाव से जोड़कर देखा जाता है कि सांसारिक शरीर का जीवन पूरा हो चुका है और अब वह धीरे-धीरे प्रकृति को समर्पित होने की प्रक्रिया में प्रवेश कर रहा है।

अंतिम संस्कार से पहले जमीन पर रखने का आध्यात्मिक संदेश
इस परंपरा के पीछे एक और महत्वपूर्ण संदेश विनम्रता का माना जाता है। जीवन में इंसान खुद को कितना भी शक्तिशाली समझे, मृत्यु के सामने सभी समान होते हैं। जमीन पर रखा पार्थिव शरीर इस बात का प्रतीक माना जाता है कि सांसारिक जीवन की सभी ऊंच-नीच, धन-दौलत और पद-प्रतिष्ठा का अंत मृत्यु के साथ हो जाता है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से यह परंपरा जीवित व्यक्ति को अपने कर्मों पर ध्यान देने और जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देने वाली मानी जाती है।
क्या हर जगह शव को जमीन पर रखा जाता है?
भारत में अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में मृत्यु के बाद की परंपराएं एक जैसी नहीं हैं। कई स्थानों पर शव को जमीन पर लिटाने की परंपरा है, जबकि कुछ समुदायों में अलग विधियां अपनाई जाती हैं। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया परिवार, क्षेत्र, संप्रदाय और स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसी एक परंपरा को सभी हिंदू परिवारों के लिए अनिवार्य नियम मानना सही नहीं होगा।

मृत्यु के बाद शरीर को जमीन पर रखने की परंपरा का सार
कुल मिलाकर, मृत्यु के बाद शव को जमीन पर रखने की परंपरा को सनातन धर्म में पंचतत्व, प्रकृति से जुड़ाव, शरीर की नश्वरता और जीवन के आध्यात्मिक सत्य से जोड़कर देखा जाता है। यह परंपरा मनुष्य को याद दिलाती है कि शरीर प्रकृति से आया है और अंततः प्रकृति में ही विलीन होना है। धार्मिक मान्यता चाहे जो भी हो, मृत्यु के बाद की रस्मों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि जीवन क्षणभंगुर है और व्यक्ति को अपने जीवन में अच्छे कर्म, सदाचार और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
यह लेख हिंदू धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और पंचतत्व से जुड़े आध्यात्मिक विचारों पर आधारित है। अलग-अलग धर्मग्रंथों, क्षेत्रों और समुदायों में मृत्यु के बाद की रस्मों और उनके अर्थ में अंतर हो सकता है। गरुड़ पुराण से संबंधित बातों को धार्मिक मान्यता के रूप में समझें, न कि वैज्ञानिक तथ्य के रूप में। Newsbag किसी धार्मिक मान्यता की पुष्टि या खंडन नहीं करता।

