By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
माउंट एवरेस्ट को दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी के रूप में जाना जाता है, लेकिन अब इसके आसपास का बेहद संवेदनशील हिम क्षेत्र तेजी से पर्यावरणीय दबाव का सामना कर रहा है। एवरेस्ट के नेपाली हिस्से में स्थित खुम्बु ग्लेशियर पर जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ बढ़ती मानवीय गतिविधियों का असर भी सामने आया है। एक नए अध्ययन के मुताबिक, एवरेस्ट बेस कैंप पर ईंधन के इस्तेमाल और ग्लेशियर पर सीधे छोड़े जाने वाले मानव मूत्र से पैदा होने वाली गर्मी इतनी है कि एक climbing season में लगभग 2,492 टन बर्फ और हिम के पिघलने के बराबर ऊर्जा पैदा हो सकती है। अध्ययन में इस अनुमान की अनिश्चितता करीब ±528 टन बताई गई है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एवरेस्ट बेस कैंप खुद खुम्बु ग्लेशियर के बर्फीले क्षेत्र पर स्थित है। हर साल पर्वतारोहियों, गाइडों, शेरपा और सपोर्ट स्टाफ की बड़ी संख्या यहां पहुंचती है। बढ़ती भीड़ के साथ बेस कैंप अब सिर्फ पर्वतारोहण के लिए अस्थायी पड़ाव नहीं रह गया है, बल्कि सीजन के दौरान एक छोटे अस्थायी शहर जैसा रूप ले लेता है।

ग्लोबल वार्मिंग सबसे बड़ी चुनौती
वैज्ञानिकों के अनुसार, खुम्बु ग्लेशियर के पिघलने की सबसे बड़ी वजह ग्लोबल क्लाइमेट चेंज है। दुनिया के कई हिमालयी ग्लेशियर लंबे समय से तापमान बढ़ने और बदलते मौसम के कारण सिकुड़ रहे हैं। एवरेस्ट क्षेत्र भी इस बदलाव से अछूता नहीं है। हालांकि नए अध्ययन का फोकस यह समझना था कि ग्लोबल वार्मिंग के अलावा स्थानीय स्तर पर इंसानी गतिविधियां ग्लेशियर पर कितना अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं। शोधकर्ताओं ने खास तौर पर बेस कैंप में इस्तेमाल होने वाले जीवाश्म ईंधन और मानव मूत्र से निकलने वाली गर्मी का अध्ययन किया।

बेस कैंप में हजारों लोग, बढ़ता ईंधन इस्तेमाल
2023 के वसंत पर्वतारोहण सीजन के दौरान करीब 50 दिनों तक एवरेस्ट बेस कैंप की गतिविधियों का अध्ययन किया गया। उस दौरान लगभग 1,600 टेंट संचालित थे। शोध के मुताबिक खाना पकाने, गर्मी और बिजली जैसी जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में LPG, केरोसिन और पेट्रोल का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन में बताया गया कि इस अवधि में लगभग 824 LPG कैनिस्टर, 18,935 लीटर केरोसिन और 5,130 लीटर पेट्रोल का इस्तेमाल हुआ। इन ईंधनों के इस्तेमाल से पैदा हुई गर्मी ने ग्लेशियर के आसपास के स्थानीय तापमान और बर्फ पिघलने की प्रक्रिया पर अतिरिक्त दबाव डाला। शोधकर्ताओं ने इन सभी गतिविधियों से पैदा होने वाली कुल गर्मी को लगभग 849,174 मेगाजूल आंका। ऊर्जा की यह मात्रा सैद्धांतिक रूप से करीब 2,492 टन बर्फ और बर्फीली सतह को पिघलाने के बराबर बताई गई है।

इंसानी पेशाब भी बना चिंता का कारण
अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला पहलू मानव मूत्र से जुड़ा है। ऊंचाई वाले क्षेत्र में रहने वाले पर्वतारोहियों और गाइडों को शरीर में पानी की कमी से बचने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना पड़ता है। इसका परिणाम यह होता है कि बेस कैंप में रोजाना बड़ी मात्रा में मूत्र पैदा होता है। शोध के अनुसार, पर्वतारोहियों और गाइडों द्वारा रोजाना 6,000 लीटर से ज्यादा मूत्र पैदा होने का अनुमान है। समस्या यह है कि इसका एक बड़ा हिस्सा सीधे ग्लेशियर की सतह पर छोड़ा जाता है। शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि मानव मूत्र से मिलने वाली गर्मी अकेले एक सीजन में लगभग 154 टन बर्फ पिघलने के बराबर हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि 154 टन बर्फ केवल पेशाब के कारण प्रत्यक्ष रूप से गायब हो जाती है। यह अध्ययन गर्मी की मात्रा को बर्फ पिघलने की संभावित ऊर्जा के रूप में परिवर्तित करके अनुमान लगाता है। इसलिए आंकड़े को इसी संदर्भ में समझना जरूरी है।

बेस कैंप का तापमान भी तेजी से बढ़ा
शोधकर्ताओं ने केवल वर्तमान गतिविधियों का ही अध्ययन नहीं किया, बल्कि सैटेलाइट डेटा के जरिए लंबे समय के तापमान बदलाव को भी देखा। 1991 से 2023 तक के Landsat सैटेलाइट रिकॉर्ड के विश्लेषण में एवरेस्ट बेस कैंप के आसपास सतही तापमान में औसतन 0.28 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष वृद्धि का अनुमान सामने आया। शोध के अनुसार, बेस कैंप के आसपास तापमान बढ़ने की गति समीपवर्ती खुम्बु ग्लेशियर की सतह की तुलना में लगभग दोगुनी थी। यह अंतर इस बात की ओर संकेत करता है कि स्थानीय मानवीय गतिविधियां पहले से गर्म हो रहे क्षेत्र पर अतिरिक्त प्रभाव डाल सकती हैं।

क्या बेस कैंप को दूसरी जगह ले जाना होगा?
अध्ययन में मौजूदा एवरेस्ट बेस कैंप को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि यदि वर्तमान स्थान पर मानवीय गतिविधियों का दबाव लगातार बढ़ता रहा तो भविष्य में बेस कैंप को अधिक स्थिर और बर्फ-मुक्त जमीन पर स्थानांतरित करने पर विचार करना पड़ सकता है। अध्ययन में दो संभावित वैकल्पिक स्थानों की भी पहचान की गई है, जो मौजूदा बेस कैंप के दक्षिण-पश्चिम में अपेक्षाकृत स्थिर जमीन पर स्थित हैं। इसका उद्देश्य पर्वतारोहण को रोकना नहीं, बल्कि एवरेस्ट के बेहद नाजुक पर्यावरण पर मानव दबाव को कम करना है।

पर्यावरण बचाने के लिए क्या कदम जरूरी?
खुम्बु ग्लेशियर को बचाने के लिए केवल पर्वतारोहियों को पेशाब करने से रोकना पर्याप्त नहीं होगा। सबसे बड़ा मुद्दा ग्लोबल वार्मिंग है, जिसके लिए वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना जरूरी है। इसके साथ ही एवरेस्ट बेस कैंप में ईंधन की खपत कम करने, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने, मानव अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन और ग्लेशियर पर सीधे कचरा या मूत्र छोड़ने से रोकने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। पर्वतारोहियों की संख्या और पर्यटन गतिविधियों को पर्यावरण की क्षमता के अनुरूप नियंत्रित करना भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

एवरेस्ट से पूरी दुनिया के लिए चेतावनी
माउंट एवरेस्ट पर खुम्बु ग्लेशियर का बदलता स्वरूप सिर्फ नेपाल या पर्वतारोहियों के लिए चिंता का विषय नहीं है। हिमालय को एशिया के बड़े जल स्रोतों में से एक माना जाता है और यहां मौजूद ग्लेशियरों में बदलाव का असर लंबे समय में नदियों, जल उपलब्धता और पर्वतीय पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है। नए अध्ययन का संदेश साफ है कि ग्लोबल वार्मिंग मुख्य खतरा है, लेकिन स्थानीय मानवीय गतिविधियां उस खतरे को और बढ़ा सकती हैं। एवरेस्ट पर बढ़ता पर्यटन दुनिया के सामने यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचने की मानवीय इच्छा के साथ उसके पर्यावरण की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीरता से निभाई जा रही है।

खुम्बु ग्लेशियर का संरक्षण केवल बर्फ बचाने का सवाल नहीं है, बल्कि हिमालय के नाजुक पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने की चुनौती भी है।

