By: Vikash Kumar Raut (vicky)
अमेरिका में चुनावी प्रक्रिया और वोटर लिस्ट की शुद्धता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव से जुड़े मतदाता रिकॉर्ड और नागरिकता संबंधी रिकॉर्ड की जांच का दावा करते हुए गैर-नागरिकों के मतदान को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। ट्रंप का कहना है कि वोटर रिकॉर्ड और नागरिकता रिकॉर्ड के मिलान के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं की जानकारी सामने आई है, जिन्हें लेकर जांच की जरूरत है। हालांकि, इन दावों को लेकर अमेरिका में राजनीतिक और कानूनी बहस भी जारी है।

ट्रंप ने हाल ही में अमेरिकी चुनावों में मतदाता पहचान और नागरिकता सत्यापन को मजबूत करने के लिए SAVE America Act पारित करने की मांग दोहराई है। उनका तर्क है कि चुनाव में मतदान करने वाले व्यक्ति की पहचान और पात्रता का स्पष्ट सत्यापन होना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने भारत की चुनाव व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में बड़ी संख्या में मतदाता पहचान पत्र के जरिए मतदान करते हैं।
2020 के वोटर रिकॉर्ड की जांच का दावा
ट्रंप ने 19 अगस्त 2026 को अपने बयान में दावा किया कि अमेरिकी प्रशासन 2020 के चुनाव के वोटर रिकॉर्ड की नागरिकता संबंधी रिकॉर्ड से जांच कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि इस प्रक्रिया में 24 हजार से अधिक गैर-नागरिकों द्वारा कथित तौर पर मतदान किए जाने की जानकारी मिली है। यह ट्रंप के लंबे समय से चले आ रहे चुनावी दावों का भी हिस्सा है। हालांकि, इस तरह के दावों को व्यापक संदर्भ में देखना जरूरी है। किसी मतदाता रिकॉर्ड में नागरिकता से जुड़ी विसंगति मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति ने अवैध तरीके से मतदान किया ही था। ऐसे मामलों में रिकॉर्ड की शुद्धता, व्यक्ति की वास्तविक नागरिकता स्थिति, पंजीकरण की प्रक्रिया और वास्तविक मतदान जैसे अलग-अलग तथ्यों की जांच आवश्यक होती है।

ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था का क्यों दिया उदाहरण?
अमेरिका में मतदाता पहचान को लेकर बहस के बीच ट्रंप ने भारत की चुनाव प्रणाली को उदाहरण के तौर पर पेश किया है। उन्होंने भारत में फोटो पहचान पत्र के इस्तेमाल और मतदान प्रक्रिया में पहचान सत्यापन की व्यवस्था की ओर ध्यान दिलाया। ट्रंप का तर्क है कि जब भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में इतने बड़े मतदाता समूह के साथ पहचान आधारित चुनाव प्रक्रिया संचालित की जा सकती है, तो अमेरिका में भी मतदाता पात्रता को लेकर अधिक सख्त व्यवस्था लागू की जा सकती है। भारत के चुनाव तंत्र को लेकर अमेरिका में चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों की चुनावी व्यवस्थाएं कई मायनों में अलग हैं। भारत में चुनावों का संचालन केंद्रीय स्तर पर निर्वाचन आयोग के नेतृत्व में होता है, जबकि अमेरिका में चुनाव प्रशासन में राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए भारत की किसी व्यवस्था को अमेरिका में लागू करना केवल नियम बदलने का मामला नहीं होगा, बल्कि इसके लिए प्रशासनिक और कानूनी ढांचे में भी बदलाव की जरूरत पड़ सकती है।

भारत में मतदाता पहचान व्यवस्था
भारत में चुनाव आयोग मतदाता सूची तैयार करने और उसे अपडेट करने की प्रक्रिया संचालित करता है। मतदाताओं के लिए चुनावी फोटो पहचान पत्र यानी EPIC लंबे समय से पहचान सत्यापन का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम खोजने, नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने और आवेदन की स्थिति देखने जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराता है। भारत की चुनाव व्यवस्था में मतदाता सूची की शुद्धता एक महत्वपूर्ण विषय है। मृत मतदाताओं के नाम हटाना, स्थान बदल चुके मतदाताओं की जानकारी अपडेट करना, डुप्लीकेट नामों की पहचान करना और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना लगातार चलने वाली प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं। इसी वजह से भारत में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर समय-समय पर राजनीतिक और कानूनी बहस भी होती रही है। इससे साफ है कि किसी भी लोकतंत्र के लिए केवल पहचान पत्र होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मतदाता सूची का लगातार अपडेट और पारदर्शी सत्यापन भी उतना ही जरूरी है।

क्या भारत का मॉडल अमेरिका में लागू हो सकता है?
ट्रंप द्वारा भारत की चुनाव व्यवस्था की तारीफ किए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारतीय मॉडल को अमेरिका में उसी रूप में लागू किया जा सकता है। विशेषज्ञ दृष्टिकोण से इसका सीधा जवाब आसान नहीं है। दोनों देशों की संवैधानिक व्यवस्था, चुनाव प्रशासन, मतदाता पंजीकरण प्रणाली और डाक मतदान के नियम अलग हैं। अमेरिका में प्रस्तावित SAVE America Act का उद्देश्य मतदाता पंजीकरण के समय नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण और मतदान के समय फोटो पहचान पत्र की आवश्यकता को मजबूत करना है। जुलाई 2026 के एक विश्लेषण के अनुसार, प्रस्तावित कानून में संघीय चुनावों के लिए नागरिकता प्रमाण और फोटो आईडी से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। भारत में पहचान आधारित मतदान को बड़े पैमाने पर लागू करने का अनुभव अमेरिका के लिए अध्ययन का विषय जरूर बन सकता है, लेकिन किसी भी व्यवस्था को लागू करते समय स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी होगा।

अमेरिका की राजनीति में बढ़ेगा विवाद?
ट्रंप के बयान से अमेरिका में चुनावी ईमानदारी, मतदाता पहचान और नागरिकता सत्यापन का मुद्दा फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। समर्थकों का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में मजबूत पहचान सत्यापन से मतदाता सूची की विश्वसनीयता बढ़ सकती है। वहीं आलोचकों की चिंता है कि अत्यधिक कड़े पहचान नियम ऐसे पात्र नागरिकों के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं, जिनके पास आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। भारत में भी मतदाता सूची और पहचान से जुड़े मुद्दे राजनीतिक बहस का विषय रहे हैं। इसलिए ट्रंप द्वारा भारतीय व्यवस्था की प्रशंसा को केवल अमेरिका की चुनावी राजनीति के संदर्भ में नहीं, बल्कि दुनिया के दो बड़े लोकतंत्रों के चुनावी अनुभवों की तुलना के रूप में भी देखा जा सकता है।

भारत के लिए क्या मायने रखता है?
अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारत की चुनाव व्यवस्था को सार्वजनिक रूप से उदाहरण के तौर पर पेश किया जाना भारतीय चुनाव प्रणाली के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी कहा है कि देश की चुनावी मशीनरी की विश्वसनीयता वैश्विक स्तर पर स्थापित है।
हालांकि, भारत की चुनाव व्यवस्था को लेकर देश के भीतर राजनीतिक मतभेद और सवाल अपनी जगह मौजूद हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का वास्तविक आधार पारदर्शिता, स्वतंत्र संस्थाएं, सटीक मतदाता सूची, निष्पक्ष मतदान और नागरिकों का विश्वास होता है।

कुल मिलाकर अमेरिका में वोटर लिस्ट की शुद्धता को लेकर छिड़ी नई बहस यह दिखाती है कि चुनावी प्रक्रिया में मतदाता की पहचान और पात्रता का सवाल दुनिया के बड़े लोकतंत्रों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। ट्रंप का भारत की चुनाव व्यवस्था को उदाहरण के तौर पर पेश करना दोनों देशों की चुनावी प्रणालियों की तुलना को नई दिशा देता है। लेकिन किसी भी देश के चुनावी मॉडल को दूसरे देश में लागू करने से पहले उसकी संवैधानिक, प्रशासनिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझना जरूरी होगा।

